पेंशन (हास्य-व्यंग्य कहानी)

“देखिये पासवान साहब, आप मेरे पिताजी के समान है, अब पिता के पैसे पर पुत्र का कुछ न कुछ तो अधिकार होता ही है। बीस हज़ार रुपये दीजिये मैं रात दिन एक करके आपकी फ़ाइल ढूंढ निकालूँगा।” कहते हुए गंगा बाबू ने मुंह के भीतर दबे पान का स्थान परिवर्तित करते हुए दायीं दाढ़ से हटाकर उसे बायीं दाढ़ों के बीच शिफ्ट किया।
“बीस हज़ार…” कहते हुए पासवान की आँखें बाहर निकल कर चश्मे के शीशे से टकराईं और पुनः अपने स्थान पर सेट हो गयीं।
गंगा बाबू ने अपनी तर्जनी पर लगे चूने को अपनी जीभ से साफ़ करते हुए कहा, “बीस कहने में आप ‘ई’ की मात्रा इतनी न खींचिए, मंहगाई बहुत है, इसी में चपरासी को भी समझना पडेगा।”
“लेकिन बेटा इतना पैसा हम लाएंगे कहाँ से।” पासवान ने विनत भाव से कहा।
“बैंक से और कहाँ से? अगर आपको और कहीं से मिलता हो तो अलग बात है।” गंगा बाबू ने अजीब सा मुंह बनाते हुए कहा। चूना उनके अनुमान से ज़्यादा था बातों के चक्कर में वे ध्यान नहीं दे पाये, उनकी जीभ का अगला हिस्सा हल्का सा ज़ख़्मी हो गया था।
पासवान ने विवशता प्रदर्शित करते हुए कहा, “बैंक में अब कहाँ बचा, आपको तो मालूम ही है दो साल आठ महीने हो गए रिटायर हुए पेंशन चालू नहीं हुई, फण्ड अटका पड़ा है। यहां रोटी के लाले हैं और आप मज़ाक कर रहे हैं। आप पेंशन चालू कराओ, आगे पीछे समझ लेंगे आपको।”
गंगा बाबू ने मन ही मन पान वाले को गाली दी, आज उसने देशी पान के पत्ते की जगह कोई दूसरा पत्ता दे दिया, स्वाद बढ़ाने के लिए चूना चाटा तो उसने जीभ काट दी, उन्होंने सारा गुस्सा पान पर उतारते हुए उसे बेदर्दी से चबाना शुरू कर दिया। सार-सार की गहते हुए तरल-तरल को मेज के नीचे रखी डस्टबिन में थूकते हुए बोले, “पेंशन और फण्ड तो आपका हक है, वह तो मिलना ही चाहिए और मिलेगा भी, लेकिन गंगा स्नान का पूरा फल तो पण्डे को दक्षिणा देकर ही मिलता है।”
पासवान ने अपनी बात दोहराई, “एक बार पेंशन चालू हो जाए आगे-पीछे आपको समझ लेंगे।”
गंगा बाबू को पान अब भूसा जैसा बेस्वाद लग रहा था, उन्हें अहसास हुआ कि पीक ही पान के प्राण होती है। डस्टबिन में उन्होंने पान के प्राण को थूक कर गलती कर दी। फिर भी बची हुई लुगदी उन्होंने मुंह के अंदर प्रत्येक स्थान पर इस आशा से घुमाई कि शायद किसी रंध्र से आनंद प्राप्त हो और बोले, “आगे पीछे? अरे पासवान साहब मकान बन जाने के बाद कोई भी राज मिस्त्री को चाय पर नहीं बुलाता, काम खत्म पैसा हज़म। आपसे छोटा ज़रूर हूँ पर बच्चा नहीं हूँ। मोटा-मोटा यह समझो कि पेंशन तब चालू होगी जब फ़ाइल मिलेगी, फ़ाइल तब मिलेगी जब आप चाहोगे। ये समझिये कि पेंशन तो अब आपके ही हाँथ में है। हम लोग तो माध्यम मात्र हैं।”
पासवान ने धीरे से कहा, “बीस अधिक हैं, कुछ कम में काम नहीं चलेगा।”
गंगाबाबू को लगा कि मुंह में ज़्यादा घुमाने के चक्कर में सुपारी का एक टुकड़ा दाढ़ में फंस गया है, जीभ का अग्रभाग चूने से ज़ख़्मी था इसलिए उसे माचिस की तीली से ही निकालना पडेगा। उन्होंने उठकर पीछे रखी लोहे की अलमारी से माचिस से एक तीली निकली और पुनः कुर्सी पर बैठते हुए बोले, “पाँच रुपये कम दे देना। अरे चौकीदार, चपरासी सबको समझना पड़ेगा, फ़ाइल ढूंढना खेल समझते हैं आप? मोल-भाव कर रहे हो, सब्जी बेच रहा हूँ क्या मैं।”
बात बिगड़ती देखकर पासवान बोल पड़े, “ठीक है, मैं कल फिर आता हूँ व्यवस्था करके। आप फ़ाइल तो  ढुंढ़वाइये।”
इस बीच गंगाबाबू ने दाढ़ में फंसी सुपारी निकाल ली थी, लेकिन अब बचे हुए पान के अवशेष भी उबाऊ लग रहे थे। उन्होंने मुंह के अंदर अजीब सा एंगल बनाते हुए पूरी लुगदी एक जगह एकत्र की और एक गोला बनाकर तेज हवा के झोके के माध्यम से ‘फुक्क’ की आवाज़ के साथ डस्टबिन में उत्सर्जित कर दिया। पानी से कुल्ली करने हुए अजीब गड़गड़ाहट की आवाज में पासवान से बोले, “कल आइये, परसों आइये, तरसों आइये, रोज़ आइये, लेकिन खाली हाँथ मत आइये। मैं फ़ाइल ढुंढ़वाता हूँ, आप निश्चिन्त रहिये, आप मेरे पिता तुल्य हैं, आपका काम होकर रहेगा।”
पासवान उठकर जाने लगे। पीछे से गंगाबाबू बोले, “कल चौरसिया का ही पान लाना, उसका ठीक रहता है। पाड़े को पान बनाने की तमीज नहीं है। आज जीभ कट गयी।”
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The पण्डित जी

बहुत भारी मन से पासवान घर पहुंचे थे, स्वास्थ्य भी अब साथ नहीं दे रहा था। पत्नी ने पानी के साथ-साथ बैंक से आये एक पत्र को थमाते हुए बिना उत्तर के लालच में एक प्रश्न किया, “कुछ बात बनी?”
पासवान ने एक ही सांस में पानी का गिलास और पत्र दोनों निपटा दिए। पत्र में जो लिखा था उसके अनुसार मकान पर बैंक कब्जा करने की सूचना दे रही थी। बैंक ने अंग्रेजी में बड़ी सभ्यता से उन्हें निहायत ही बेईमान और मक्कार व्यक्ति लिखा था। साथ ही फ़ौरन उपस्थित होकर अपना मत स्पष्ट करने का धमकीनुमा आग्रह भी किया था। उन्होंने घड़ी पर नज़र डाली, चार से कुछ कम बजा था, अगर फ़ौरन चल दें तो बैंक खुला मिल सकता था। वे तुरंत निकल पड़े। पीछे से पत्नी ने पत्नी की ही तरह प्यार प्रदर्शित करते हुए कहा, “अरे खाना तो खा कर जाओ। आये और चल दिए, घर न हो गया सराय हो गयी दिन भर पागलों की तरह…….”
बैंक खुला देखकर पासवान ने राहत की सांस ली। फ़ौरन बैंक मेनेजर से मिलकर एक माह का मौक़ा लेना था। जैसे ही वे मैनेजर के कमरे की और बढे उनके चपरासी ने मुंह के बजाय भौहों के माध्यम से पूछा, “किससे मिलना है।”
पासवान ने मुंह से ज़वाब दिया, “मैनेजर साहब से।”
चपरासी बोला, “बस निकल ही रहे हैं फौरन मिल लो। वैसे क्या काम है?”
पासवान ने जवाब देने के बजाय अंदर झाँककर पूछा, “अंदर आ जाऊं श्रीमान जी।”
मैनेजर टेलीफोन पर किसी से बात कर रहे थे लिहाजा हाँथ के इशारे से कुर्सी की और बैठने का संकेत किया और वार्ता में मशगूल हो गये, “पुलिस कुछ नहीं करेगी, साथ में अपने आदमी भी रखना, फेंक दो साले का सामान घर से बाहर। मुझे मकान खाली चाहिए बस।”
टेलीफोन में उधर से जो कहा जा रहा था वह उन्हें नहीं सुनाई दिया। मैनेजर गुस्से में चिल्लाया, “बुजुर्ग है तो हम क्या करें, पेंशन नहीं चालू हुई तो हमारा क्या दोष। आप लोगो को कमीशन किस बात का देते हैं, कि आप हमे प्रवचन दें, न कर पाओ तो बताओ। पप्पू ढक्कन से बात करें। साले पुराने मैनेजर ने भिखारियों को होम लोन बाँट दिया, वसूली हमें करनी पड़ रही है। ऊपर से रोज दबाव पड़ रहा है, धर्म खाता नहीं खोल कर बैठी है बैंक समझे। कुछ भी करो, चार दिन में हमें मकान पर कब्जा चाहिए बस….”
पासवान समझ गए कि उन्ही के मकान खाली कराने की बात चल रही है। मैनेजर कुछ सख्त जान पड़ रहा था। बात कैसे की जायेगी, ये मानेगा भी या नहीं, जीवन भर किराए के एक कमरे रहे। जिसके बाएं कोने में किचन, दायें कोने में स्टोर, सामने जमीन पर छह बाई साढ़े तीन की दरी का बेड रूम, उससे सटी शेष जगह में दोनों बच्चों का स्टडी रूम कम डाइनिंग रूम जोकि रात्रि ग्यारह बजे के बाद बच्चों का बैडरूम भी हो जाता था, सारा कुछ आँखों के सामने से घूम गया। पेट काटकर जो पैसे जोड़े थे उससे जमीन ली और फण्ड के पैसे की आशा में लोन लेकर मकान बनवाया, फण्ड आया नहीं मकान जाने वाला है। वे अंदर-अंदर बहुत घबरा गए।
मैनेजर फोन रखकर पासवान से मुखातिब हुआ, “हाँ… तो बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”
पासवान उसके गुस्से को फोन की वार्ता से समझ चुके थे, हड़बड़ा कर बोले, “जी वो खाता खुलवाना था आपकी बैंक में।”
बैंक मैनेजर एकदम से भड़क कर खड़ा हो गया, “तो… बाहर फार्म लेकर जमा कर देना था, यहां कहाँ घुसे चले आये। दिमाग खराब है आपका। हर काम मैनेजर ही करता है क्या?” कहते हुए उन्होंने चपरासी को आवाज़ दी, “राम लोचन……”
चपरासी फ़ौरन हाज़िर हुआ, मैनेजर ने पासवान की तरफ इशारा करते हुए व्यक्ति की जगह वस्तु वाचक संज्ञा में कहा, “ये क्या है?”
चपरासी ने कन्धों को ऊपर उचकाया और दोनों हथेलियों को इस तरह घुमाया जिसका अर्थ था मुझे क्या मालूम।
मैंनेजर को देखकर ऐसा लगा कि जैसे किसी ने पहले से भड़के हुए सांड को लाल कपडा दिखा दिया हो, बोला, “अबे कभी-कभी मुंह से भी बोला कर।”
चपरासी अजीब सी आवाज़ में मुंह ऊपर की ओर करके बोला, “पान मसाला खाये है अभी-अभी, आप पान मसाले पर प्रवचन देने लगेंगे इसलिए नहीं बोला।”
मैनेजर ने गुस्से में कहा, “खाता खुलाने के लिए मेरे पास आये हैं, अब मैं बैठकर इनका खाता खोलूँ? जिसको देखो अंदर घुसता चला आता है। तुम क्या कर रहे हो बाहर?”
चपरासी ने सफाई दी, “मैंने पूछा था इनसे, पर इन्होंने बताया ही नहीं। मैं समझा कि कोई बड़ा काम होगा। अब मुझे क्या मालूम था कि ये सौ वाट का बल्ब जलाने के लिए भाखड़ा नांगल बाँध में कटिया फॅसा देंगे।”
पासवान तब तक उठ कर बाहर आ गए चपरासी ने पीछे से आकर उन्हें एक कागज़ थमाया और बोला, “कल साढ़े दस बजे इसे पूरा कम्पलीट करके सात नम्बर काउंटर पर जमा कर देना।
पासवान ने कागज़ लिया और भारी मन से घर की ओर चल दिए।
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बीस हज़ार रुपये लेकर गंगा बाबू ने अपना काम पूरी ईमानदारी से कर दिया था। वह फ़ाइल जो विगत दो वर्ष आठ महीने से खोई हुई थी अचानक उन्ही की अलमारी में बरामद हो गयी।
“बहुत मेहनत करनी पड़ी इसे ढूँढने में”, गंगा बाबू ने मेज पर फ़ाइल पटकते हुए कहा। फ़ाइल पटकने के ढंग से दो अर्थ एक साथ निकल रहे थे पहला मुश्किल से मिलाने का रोष और दूसरा उसपर जमी धूल की सफाई।
पासवान फ़ाइल के दर्शन मात्र से स्वयं को धन्य महसूस कर रहे थे। आज उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ कि अब पेंशन मिल जायेगी। बोले, “बहुत दौड़ना पड़ा ये दिन देखने के लिए।”
गंगा बाबू ने पुराने पान का मलवा डस्ट बिन में उड़ेला और नए पान को मुंह के हवाले करते हुए कहा, “पेंशन दफ्तर वह तीर्थ स्थान है जहां हर सरकारी कर्मचारी को बार-बार आना पड़ता है। ये कोई गंगा सागर तो है नहीं कि सब तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार। आपका काम तो फिर भी जल्दी हो गया, लोग दस-दस साल से चक्कर लगा रहे है। कई लोगों को तो यहां की फाइल नहीं मिली उधर यमराज की फाइल खुल गयी। पेंशन खाते में जमा नहीं हुई यमराज ने उन्हें ही जमा कर लिया। आप वास्तव में भाग्यशाली है। पेंशन में देर तो लगती ही है। सरकार को भी पता है कि पेंशन प्रारम्भ कराने के लिए  बहुत चक्कर लगाने पड़ते हैं, इसके लिए खाली आदमी चाहिए, इसलिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन का प्राविधान रखा। ताकि पेंशनर ठीक से अपनी पैरवी कर ले।”
पासवान की फ़ाइल अभी भी गंगा बाबू के कब्जे में थी अतः उन्हें उनकी बात से सहमत ही होना पड़ा, “ठीक कह रहे हो आप।  अब पेंशन कब से शुरू हो जायेगी और फण्ड का चेक कब मिलेगा।”
गंगा बाबू पान का पहला पीक थूकना नहीं चाह रहे थे उन्हें मालूम था कि किमाम की सारी खुशबू पहले पीक के साथ ही निकल जाती है, पान में फिर वह मज़ा नहीं रहता लेकिन उनसे बीस हज़ार रुपये अभी-अभी लिए थे इसलिए नैतिकता के आधार पर जवाब तो देना ही था। पीक और शब्दों में सामंजस्य बैठाने के लिए उन्होंने अपना मुंह ऊपर की ओर कर के संक्षिप्त सा उत्तर दिया, “बहुत जल्द।”
पासवान ने उत्सुकता वश पुछा, “फिर भी कब तक?”
गंगा बाबू को लगा कि इस बात के जवाब में लंबा बोलना पड़ेगा अतः उन्होंने भारी मन से डस्ट बिन में थूकने के बाद कहा, “अब इस बात का गारंटीड जवाब मेरे पास नहीं है, ये समझिये कि फण्ड का चेक आपके घर रजिस्टर्ड डाक से पहुंचेगा और पेंशन सीधे आपके अकाउंट में। आप आराम से अपने घर में बैठकर इंतज़ार करिये। अब हम और आप कुछ नहीं कर सकते जो भी करेंगे वो ईश्वर प्रसाद यादव करेंगे।” कहते हुए उन्होंने सामने बैठे बड़े बाबू ईश्वर प्रसाद यादव की ओर इशारा किया।
पासवान को लगा कि वो आसमान से गिरे और खजूर पर न गिर कर कटीली झाड़ी में गिर गए हैं। ईश्वर प्रसाद यादव उन्हें शक्ल से गंगा बाबू से अधिक धूर्त जान पड़ रहा था। वे बड़े बाबू की ओर जाने लगे, पीछे से गंगा बाबू अपने कुर्ते पर गिरे पान को साफ़ करते हुए बोले, “अरे अपनी फ़ाइल भी ले जाओ उन्ही को दे देना। फ़टाफ़ट सब काम हो जाएगा।”
ईश्वर प्रसाद ने फ़ाइल देखकर हिसाब लगाया और बोले,  “सत्रह लाख के करीब फण्ड और पंद्रह हजार के आसपास प्रतिमाह पेंशन बनेगी, भाई बधाई हो। गंगा को कितना दिया?”
पासवान ने बात को छिपाने के प्रयास में कहा, “अरे वह तो घर का बच्चा है उसे क्या देना।”
ईश्वर प्रसाद बोले, “झूठ मत बोलिये, साला अपने सगे और इकलौते बाप की फ़ाइल बढ़ाने में बारह हज़ार मेरे माध्यम से वसूला था आपको क्या ख़ाक छोड़ेगा। खैर जो भी हो मुझे क्या। पचास हज़ार लगेंगे तीसरे दिन भविष्य निधि का चेक आपके घर पहुँच जाएगा।”
पासवान को लगा कि या तो उनके कान के सिग्नल कमज़ोर है, अथवा ईश्वर प्रसाद यादव का मुंह ठीक से काम नहीं कर रहा है। इतने से काम के लिए पचास हज़ार नहीं हो सकता। उन्होंने अपने कान को उनके मुँह की सीध में करते हुए पूछा, “कितना?”
“पचास हज़ार…” ईश्वर प्रसाद ने काफी तेज़ और डंके की चोट पर वाली स्टाइल में कहा।
पासवान को सुनकर चक्कर आ गया, बिना पूछे वे सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गए। इतने रुपये की व्यवस्था करना उनके सामर्थ्य में नहीं था। उन्हें लगा कि उनके हाँथ में पेंशन वाली रेखा नहीं है। जीवन रेखा ने पेंशन रेखा को काट दिया है।
बाहर आकर उन्होंने सरकारी नल से पानी पिया और अपने घर के बजाय लक्ष्मी कान्त के घर की ओर चल दिए।
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रिटायरमेंट के बाद पहली बार पासवान इतनी देर से घर आये थे। चेहरा उतरा, कंधे झुके, बाल बिखरे हुए और थकावट चेहरे से टपक रही थी। पासवान की पत्नी दयावती ने उन्हें देखकर अंदाज़ा लगाया कि किसी ने उन्हें पचास जूते मारे है। पासवान सोफे पर इस आशय से बैठे ताकि ज़रुरत पड़ने पर लेट भी सकें। पत्नी सामने कुर्सी पर बैठ कर उनसे आज के अपडेट्स लेने लगी।
गले में कुछ फंसा न होने के बावजूद पासवान गला साफ़ करने की स्टाइल में बोले, “आज बड़े बाबू पचास हज़ार मांग रहे थे।”
दयावती की आवाज सामान्य महिलाओं की आवाज से कुछ ज़्यादा कर्कश थी, जब वे बोलती थीं तो ऐसा लगता था कि महिलाओं का एक समूह एक साथ बोल रहा हो। अपनी शक्ल, स्वभाव और स्वर का जो तालमेल उन्होंने बैठाया था वह पुरस्कार योग्य था, पासवान जब सेवानिवृत्त नहीं हुए थे तब वे अधिकतर कार्यालय में ही रहते थे। इससे पत्नी के प्रकोप से उनका सामना कम होता था। किन्तु अब उनके पास कोई विकल्प भी नहीं था।
स्वभाव के अनुरूप दयावती बोलीं, “अरे, आप तो आज बीस हज़ार लेकर गए थे। वो किसे पकड़ा आये।”
पासवान ने समझाने का प्रयास करते हुए कहा, ” वो तो गंगा बाबू की फीस थी। वो छोटे बाबू हैं।”
दयावती वाकयदे भड़कते हुए बोलीं, “इसके बाद मंझले बाबू अपनी फीस मांगेगे, तुम्हे सब बेवकूफ समझते हैं। खुद कभी चवन्नी नहीं ली और अब बाँट रहे हो प्रसाद। हद है।”
पासवान को सांस लेने में आज कुछ ज़्यादा ही जोर लगाना पड़ रहा था, आज से पहले वे कभी भी नहीं जान सके कि वे कब सांस खीच रहे है और कब छोड़ रहे है लेकिन आज उन्हें सांस खीचना भी एक काम की तरह लग रहा था।
तब तक दयावती ने दूसरा विस्फोट किया, “आज बैंक ने कुछ गुंडे भेजे थे। दरवाजे पर गाली गलौज करके गए हैं। कह रहे थे कल सुबह तक मकान खाली चाहिए वरना सारा सामान सड़क पर फेंक देंगे।”
पासवान ने सोफे पर लेटते हुए कहा, “कल तो फण्ड का चेक मिल जाएगा, जिसे दिखाकर बैंक को समझाया जा सकता है। तुम चिंता न करो।”
दयावती ने आशंका व्यक्त की, ” लेकिन पचास हज़ार आएंगे कहाँ से।”
पासवान ने कहा, “उसकी चिंता तुम न करो। व्यवस्था हो गयी है। आज रात तक बड़ेबाबू के घर पैसा पहुँच जाएगा।”
“लेकिन कैसे? चिराग घिसकर जिन्न निकालोगे क्या? तुम्हारा नाम अलादीन पासवान नहीं देवीदीन पासवान है। ये याद रखो।” इस बार दयावती के स्वर में करुणा भी थी।
“तुम पानी लाओ बस”, कहकर उन्होंने अपनी आँखे बंद कर लीं। पूरे दिन की घटनाएं एक साथ उनके दिमाग पर हथौड़े मारने लगीं। पेंशन ऑफिस से सीधे वे लक्ष्मीकांत के घर गए थे। वहां हुई वार्ता और पैसे के इंतजाम की प्रक्रिया पत्नी को बताकर उसे एक नया कष्ट देना नहीं चाह रहे थे। आज के दिन का उत्तरार्ध उनके जीवन का संभावतः सबसे भयानक समय था। पचास हज़ार के इंतजाम ले लिए लक्ष्मीकांत ने उन्हें अपनी किडनी बेचने की राय दी थी और इसके लिए एक डॉक्टर से भी मिलवाया था। सारे दृश्य किसी चलचित्र की तरह आँख बंद करते ही बार-बार सामने प्रकट हो जा रहे थे।  हर दृश्य के बाद एक काले कपडे में राक्षसी अट्टहास करती हुई आती और उनकी तरफ हाँथ से कारुणिक इशारा करके गायब हो जाती।
डॉक्टर कह रहा था, “किडनी तो निकाल लेंगे, लेकिन इनकी उम्र ज़्यादा है। अब ये भारी काम बिल्कुल नहीं कर पाएंगे। अगर राजी हों तो तीन दिन बाद ऑपरेशन कर दूं।” फिर राक्षसी हंसती हुई आयी और गायब हो गयी।
लक्ष्मी कान्त कह रहे थे, “पैसा आज शाम को ईश्वर प्रसाद यादव के घर पहुँच जाएगा आप चिंता न करें।” राक्षसी फिर हँसते हुए आयी और गायब हो गयी।
लक्ष्मी कान्त अपने फोन से बड़े बाबू ईश्वर प्रसाद यादव से बात कर रहे थे कुछ देर बाद उन्होंने पासवान को फोन दे दिया, दूसरी तरफ से ईश्वर प्रसाद बोल रहे थे, “पासवान साहब आप चिंता न करें कल सुबह आपके घर चाय पीने आ रहा हूँ, लगे हाथों भविष्य निधि का चेक भी दे दूंगा।” इसबार राक्षसी नहीं पत्नी ने झकझोर कर उठाया, “ये लो पानी, अरे तुम्हारा चेहरा इतना पीला क्यों है क्या हुआ?”
पासवान को अहसास हुआ कि यदि वे बोलेंगे तो बहुत ताकत खर्च होगी, उन्होंने हाँथ के इशारे से उन्हें जाने को कहा। एक गिलास पानी उन्हें समुद्र से कम नहीं लग रहा था किसी तरह सामने रखी सेंटर टेबल पर बिना पानी पिए उसे पटका और आँख बंद करके लेट गए। इसबार उन्हें लगा कि राक्षसियों का झुण्ड रुदन करता हुआ उनके पास आ रहा था।
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सुबह जब ईश्वर प्रसाद यादव भविष्य निधि का चेक लेकर पासवान के घर पहुँचे उस समय तक पासवान उसी सोफे पर लेटे स्वयं को असहाय सा महसूस कर रहे थे।
“ये लीजिये अपना सत्रह लाख का चेक और हाँ मैंने उस किडनी तस्कर लक्ष्मीकांत को बिना पैसे लिए भगा दिया था कल शाम। आपको बताना चाहिए था कि पैसे नहीं है मैं दूसरा रास्ता निकालता। सरकारी कर्मचारी के पास पचास रास्ते हमेशा रहते हैं। किडनी बेचकर भविष्य निधि लेना कहाँ उचित है। चेक बैक में जमा कीजिये और पैसा मिलते ही डॉट डॉट डॉट।”
पासवान को लगा कि उन्हें किसी ने संजीवनी बूटी का आसव पिला दिया हो। एक दम से उठकर बैठ गए। सारा नैराश्य भाव एक क्षण में लुप्त हो गया। उन्हें आज फिर अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ। ईश्वर प्रसाद यादव में उन्हें भगवान् श्री कृष्ण की छवि दिखने लगी। उन्होंने फिर आँखे बंद करके राक्षसियों को चेक करना चाहा किन्तु इसबार उन्हें मुस्कराती हुई अप्सराएं दिखाई देने लगीं।
पत्नी को आवाज देते हुए चिल्लाये, “अरे देखो अपना ईश्वर आया है, कुछ चाय वाय लाओ भाई। ये एक गिलास पानी से क्या होगा और ले आओ। बहुत प्यासा हूँ।”
दयावती ने पासवान को इतना खुश कभी नहीं देखा था, आज खुश देखकर बहुत आनंद का अनुभव कर रही थी। हालांकि इस बीच पासवान ने फण्ड का चेक उन्हें थमा दिया था लेकिन उन्हें पासवान के चेहरे की मुस्कान आज अधिक मूल्यवान लग रही थी। पासवान ने देखा कि दयावती ने अभी तक चेक की धनराशि भी नहीं देखी है। वह तो अपलक पासवान के चेहरे को निहार रही है अर्थात उसकी असल परेशानी पासवान का परेशान रहना था न कि अभावों से संघर्ष। दोनों लोग एक दूसरे को खुश देखकर गदगद हो रहे थे।
ईश्वर प्रसाद यादव बोल पड़े, ” ये लैला-मजनू, लैला-मजनू बाद में खेल लेना। पहले मुझे चाय तो पिलाओ।”
दयावती इस तरह शर्मा कर अंदर भागी जैसे पहली बार मैके आये पति से छिपकर बात करते हुए पिता जी ने देख लिया हो।
चाय का कप रखते ही ईश्वर यादव बोले, “बहुत बहुत धन्यवाद अब मैं दफ्तर जा रहा हूँ रास्ते में ज़रा बैंक के मैनेजर से भी मिलना है। जगदीश मेरे साथ ही पढता था, अब यहीं ट्रान्सफर होकर आया है। अरे हाँ… आपको भी तो चेक जमा करनी है चलिए एक से भले दो आपका भी परिचय करा देंगे।”
पासवान को लगा कि दुखान्त हो रही कथा तो घनघोर सुखान्त की कगार पर है। इसमें धन्यवाद ईश्वर प्रसाद यादव को दें या ईश्वर को।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।
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मेरा अनफिक्स्ड क्रिकेट मैच (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

गिल्ली डंडा खेलने वाली अन्तिम और गली में क्रिकेट खेलने वाली प्रथम पीढ़ी होने का सैभाग्य हमारी पीढ़ी के नाम ही जाता है। सशरीर खेले जाने वाले खेल हमारी पीढ़ी ने इतना खेल डाले कि वर्तमान पीढ़ी को खेलने के लिए कुछ बचा ही नही। विज्ञान को विवश होकर वीडियो गेम मोबाइल गेम और पबजी आदि का आविष्कार करना पड़ा। क्रिकेट उस समय अपनी उठान पर था। रेडियो पर कमेंट्री सुनकर हुक शॉट लगाने की कला और बिना टप्पे के बाउंसर फेंकने का चलन उसी समय शुरू हुआ था। सुरक्षा कवच के नाम पर हेलमेट आदि मोटर साइकिल और स्कूटर चलाने वाले ही लगाते थे, बैट्समैन का सिर काफी मजबूत आता था उनदिनों।

एक बार विद्यालय स्तरीय क्रिकेट टूर्नामेंट मे मैं भी फंस गया। मेरे मित्र थे मुजीब भाई उस समय मद्दे के ज़माने में भी वे डेढ़ सौ मील प्रति घंटा के हिसाब से गेंद फेक देते थे। हम दोनों थे तो मित्र मगर टीमें अलग अलग थीं। एक समय ऐसा आया जब मैं बैटिंग कर रहा था और मुजीब भाई बोलिंग। मुजीब भाई के सामने बैटिंग करना यमराज की कुण्डी खटखा कर भागने जैसा माना जाता था।

उन्होंने ओवर की पहली गेंद फेंकी। मेरी खासियत यह भी है कि अगर सौ तक कि स्पीड में गेंद आएगी तभी मुझे दिखती है, उससे तेज गति की गेंद नही दिखती। उनकी गेंद 150 की स्पीड से मेरी ओर बढ़ी, चूंकि मैं कन्फर्म था कि नही दिखेगी लिहाजा आँखें खुली रखने का कोई फायदा नही था,  सो मैंने आंखे बन्द कर लीं। शरीर मे कान  बंद करने का कोई ऑप्शन भगवान ने दिया नही है इसलिए कान खुले रह गए। गेंद कान के पास से ज़ूऊऊऊऊ….. की आवाज़ करते हुए निकल गयी। मेरे पूरे शरीर ने राहत की सांस ली।

मैं भाग कर मुजीब भाई के पास गया मैंने आठ साल की अपनी दोस्ती और अपने और उनके दादाजी की पचास साल की मित्रता की दुहाई देते हुए कहा कि ऐसा करो एक सीधी गेंद धीरे से फेंक दीजिए मैं बल्ला नही लगाऊंगा और आउट हो जाऊंगा। मुजीब मान गया।

मुजीब ने 75 की स्पीड से अगली गेंद सीधी फेंक दी। भगवान जाने कैसे बल्ला गेंद की सीध में आ गया और गेंद उसका चुम्बन लेती हुई चौके वाली रस्सी से जा टकराई। मुजीब भाई आग्नेय दृष्टि से मुझे घूर रहे थे, आत्मग्लानि से लबरेज मैं नज़रे चुराता हुआ बल्ले से ठोंक कर पिच ठीक करने का झूठा अभिनय करने लगा। मेरे बायोलॉजी के मास्टर गुप्ता जी जो कि अंपायरिंग कर रहे थे, वे चौके का इशारा करते हुए कह रहे थे, “मुजीब की गेंद पर चौका? अब तो बेटा तू गया।”

मेरा मन कर रहा था धरती फटे और मैं उसमे समा जाऊं। उधर मुजीब ओवर की तीसरी गेंद फेकने की गरज से अपने बोलिंग रनअप पर गेंद से अपनी गलहरी की दाद खुजलाते हुए चल दिया। इधर मैं यह सोचने में व्यस्त हो गया कि शरीर के किस अंग पर गेंद लगे जहां दर्द अपेक्षाकृत कम होता हो। मुजीब की तीसरी गेंद कब आई और कैसे मैं अस्पताल आया मुझे अभीतक याद नही है।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ
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रामलीला टू पॉइंट ओ (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

कानपुर के जगन्नाथ की रामलीला पार्टी बहुत मशहूर थी उन दिनों। बहुत बढ़िया रामलीला खेलते थे। जगन्नाथ पार्टी मालिक थे इसलिये पैसा बचाने के लिए उन्हें खुद बहुत से रोल करने पड़ते थे। जनक, भरत, केवट और सुलोचना का चरित्र ऐसा उतार देते थे कि स्वर्ग से असली वाले किरदार भी सोचने पर विवश हो जाते कि ऐसा तो हम भी न कर पाए। मेरे गांव में उस वर्ष उन्ही की पार्टी रामलीला खेलने आई थी।

गया प्रसाद और प्रयागी आपस मे एक दूसरे के सगे भाई थे। रामलीला मैदान से उनका मकान इतना सटा हुआ था कि पिछले साल लंका समझकर हनुमान जी ने उन्ही के छप्पर में पूछ छुआ दी थी। तब गया और प्रयागी का आपस मे इतना विवाद नही था इसलिए दोनों भाइयों ने आग बुझाने के बजाय रामलीला पार्टी पर चढ़ाई कर दी और एक-एक पैसा वसूल लिया।

इस वर्ष दोनों भाइयों में इस कदर झगड़ा था कि उसके गम में प्रयागी शराब पीने लगा था। शराब पीकर वह गया प्रसाद को इस प्रकार की गालियां देता था जो न चाहते हुए भी समान रूप से उस पर भी लागू होती थी। कभी-कभी वाकयुद्ध  मल्लयुद्ध से होता हुआ मलयुद्ध तक पहुंच जाता। गया प्रसाद को भी उसके लेवल में आने के लिए शराब की शरण मे जाना पड़ता, कुल मिलाकर शराब ही एक ऐसा माध्यम थी जो दोनों भाइयों को आपस मे जोड़े थी। कभी-कभी शराब उन्हें इतना जोड़ देती, कि बाद उन्हें अलग- अलग करने के लिए चार आदमी लगते थे।

उस दिन रामलीला में भरत मिलाप का खेल चल रहा था। राम अयोध्या जाना नही चाह रहे थे और जगन्नाथ यानी भरत पार्टी मालिक होते हुए भी उनकी अनुनय विनय कर रहे थे। राम और भरत का बहुत बढ़िया संवाद चल रहा था।

गया प्रसाद के चबूतरे पर पड़े तखत पर बैठकर बैजनाथ, कन्नौजिया मास्टर, और प्रयागी रामलीला का आनन्द ले रहे थे। कुछ दूर एक कुर्सी पर बैठे गया प्रसाद भ्रात प्रेम देखकर विव्हल हुए जा रहे थे। उनकी आंखों से आंसू रुकने का नाम नही ले रहे थे। आज उन्हें अहसास हो रहा था कि शराब व्यक्ति को कितना भावुक कर देती है। जैसे ही भरत ने भगवान राम की खड़ाऊँ लेकर अपने मस्तक पर लगायी उन्होंने कनखियों से प्रयागी की तरफ देखा। बैजनाथ और कन्नौजिया मास्टर को राम-भरत संवाद से अधिक रोचक गया-प्रयागी संवाद लगता था। इसलिए मजा लेने के उद्देश्य से बैजनाथ बोले, “देखा! इसे कहते है भाई-भाई का रिश्ता।”

कन्नौजिया मास्टर ने थोड़ा ज्ञान झाड़ते हुए कहा, “ये आदर्श भ्रात प्रेम है भैया।”

प्रयागी को लगा कि गया प्रसाद के इशारे पर उसपर ये व्यंग्य बाण छोड़े जा रहे हैं। प्रयागी ने गया प्रसाद की तरफ इशारा करते हुए कहा, “हर बड़ा भाई राम ही नही होता। कुछ साले रावण से भी बद्दतर भाई पड़े है दुनिया मे।”
गया प्रसाद जो अभी तक त्रेतायुग मे विचरण कर रहे थे प्रयागी के इस वाक्य ने उन्हें धड़ाम से कलयुग के चौथे चरण में पटक दिया। उन्होंने एक भरपूर थप्पड़ प्रयागी के गाल पर जड़ दिया।

प्रयागी ने पास पड़े पत्थर को गया की तरफ सर फोड़ने के उद्देश्य से फेंका, लेकिन नशे के कारण निशाना सही नही लगा और पत्थर का मिलन गया के सिर की बजाय बैजनाथ के चरणों से हुआ।

बैजनाथ “हू हू हू हू” करते हुआ तखत पर लोटने लगे।
गया उठकर रामलीला मंच की तरफ भागे। पीछे-पीछे प्रयागी गालियां देते हुए उसी दिशा में दौड़े। गया ने मंच पर  पंहुच कर माइक पकड़ लिया और माइक से प्रयागी को भला बुरा चिल्लाने लगे। राम, भरत सहित सारे कलाकार कुछ समझ पाते इससे पहले प्रयागी पर्दे के पीछे से रावण की चंद्रहास तलवार उठा लाया और गया पर झपटा, गया एकदम से पीछे हट गए। तलवार के वार से पर्दा चर्रर्रर्रर्रर की आवाज से दो टुकड़ों में बंट गया। पर्दे के पीछे अपने रोल का इंतज़ार कर रहे कलाकार और बीड़ी पीता हुआ कैकेयी दिखने लगा। दर्शकों में भगदड़ मच गई। हांथ में खड़ाऊँ पकड़े हुए भरत उर्फ जगन्नाथ इस असमंजस में थे कि खड़ाऊँ लेकर अयोध्या जाऊं या सामान समेट कर कानपुर।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ
#Theपण्डितजी वाले

तलाक़-ए-नूर (हास्य-व्यंग्य कहानी)

नूर मोहम्मद केवल उनका नाम ही था, जबकि न तो उनमे नूर था और न ही मोहम्मद। वे खुदा के फज़ल से बदसूरत नहीं थे बल्कि खुद की कोशिशों से उन्होंने ये बदसूरती डेवलप की थी। नूर मोहम्मद नौ बच्चों के बीच इकलौते बाप थे। वैसे तो नसरीन बेगम उनकी शरीक-ए-हयात थी, लेकिन उनकी जिन्दगी जहन्नुम बनाने में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। नूर मोहम्मद की नसरीन बेगम से निकाह के फ़ौरन बाद अर्थात तीसरा कबूल कहते ही पटनी बंद हो गयी थी। जबतक नसरीन उनकी फुफेरी बहन थी तबतक उसका स्वभाव अच्छा था लेकिन बेगम बनते ही पता नहीं कौन से जिन्न ने उसके शरीर में प्रवेश कर लिया था कि उसने नूर मोहम्मद का जीना मुहाल कर दिया। फिर भी उन दोनों के सवा साल प्रति बच्चे की दर से नौ बच्चे थे। बुजुर्गों की “दूधों नहाओ, पूतों फलों” की आधी दुआ उनपर भरपूर असर कर गयी थी।

बचपन में जिस मदरसे से नूर मोहम्मद ने तालीम हासिल की थी उन्होंने उसी मदरसे में अपनी औलादों को भी पढ़ाया, और जिस कालेज में वे नहीं पढ़े थे बच्चे भी उसमे पढ़ने के लिए नहीं भेजे। कुल मिलाकर मदरसे से अधिक तालीम की उनके खानदान में रवायत नहीं थी।

नूर मोहम्मद को पूरी कुरआन कंठस्थ थी, लेकिन एक भी आयत हृदयस्थ नहीं हुई थी इसीलिये न तो उन्हें इस्लाम का ज्ञान था और न ही किसी अन्य धर्म की जानकारी।
वर्त्तमान समय में नूर मोहम्मद की उम्र चालीस साल के आसपास है। उनके निकाह को सोलह साल हो गए है। उनका मत है कि इतने साल इस प्रकार की बीवी के साथ गुज़ारने के एवज में सरकार को उन्हें मुवाबजा देना चाहिए। लेकिन उनकी आवाज़ उठाने के लिए कोई संस्था आगे नहीं आ रही है। इसलिए विवश होकर उन्होंने तलाक देने का मन बनाया। लगभग सभी बच्चे अपने पैरों पर खड़े क्या, बल्कि चलने भी लगे है, दो बच्चे शकूर के कारखाने में दरदोजी काम करते है। दो स्कूटर में हवा भरने के अलावा थोड़ा बहुत मिस्त्रीगिरी भी जान गए हैं। एक हाफ़िज़ मास्टर से टेलरिंग सीख रहा है। शेष अभी बहुत छोटे है इसलिए उनकी जिम्मेदारी माँ के हिस्से में आएगी। कुल मिलाकर तलाक देने में कोई नैतिक, सामाजिक या कानूनी अड़चन नहीं आयेगी। लेकिन समस्या यह कि तलाक दिया कैसे  जाए?

नसरीन की जबरता उनकी सहजता पर हाबी थी. जब भी वे तलाक का माहौल बनाने का प्रयास करते नसरीन उन्हें कूट देती। वे तीन बार तलाक… तलाक… तलाक… कहने के लिए मुंह खोलने ही वाले होते कि उनके मुंह से तड़ाक !!! तड़ाक !!! तड़ाक!!!  के स्वर नसरीन बेगम गुंजायमान कर देती।

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शरीफ कुरैशी, नूर मोहम्मद के बचपन का दोस्त था। दोनों एक साथ मदरसे से भगाये गए थे। सबक याद करने में दोनों कच्चे थे। एक दिन तंग आकर रसीद मौलवी ने सबक ठीक से न सीखने के कारण दोनो को दो-दो थप्पड़ रसीद कर दिए। फलस्वरूप छुट्टी के बाद दोनों ने मिलकर रसीद मौलवी को ठीक से सबक सिखा दिया। पाँच दिन बाद जब रसीद मौलवी चलने लायक हुए तो उन्होंने  मदरसे के फादर से कहकर दोनों को मदरसे से निकलवा दिया। इन दोनों ने भी आगे की पढ़ाई का मोह त्याग कर जितना भी अभी तक पढ़ा था उतने में संतोष कर लिया।
शरीफ ने हामिद लंगड़े का गैंग ज्वाइन करके गिरहकटी सीख ली और नूर मोहम्मद ने अपने वालिद को प्रॉपर्टी से बेदखल करते हुए उनकी परचून की दुकान हथिया ली। इस प्रकार दोनों अपने-अपने पैरों पर खड़े हो गए। कुछ दिनों बाद शरीफ को अहसास हुआ कि उसके गिरहकटी के व्यापार को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है पुलिस को उनका यह व्यापार अच्छा नहीं लगता इसलिए उन्हें अक्सर पकड़ कर थाने में बंद कर देती है। अपने प्रति पुलिस का रवैया उचित न देखकर उसने कुछ नया करने का मन बनाया और वर्तमान समय में वह बैगर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट चलाता है। जिसमे मेलों में खोए, बांग्लादेश और नेपाल से उठवाए गए बच्चों को भीख मांगने लायक बनाया जाता है। ज़रुरत पड़ने पर उनके अंग भंग कर दया का पात्र बनाकर बड़े-बड़े शहरों में सप्लाई करने का धंधा भी करने लगा। यतीमखाने की आंड़ में यह धंधा बड़े जोर शोर से फलने लगा और पैसा आने पर शरीफ फूलने लगा। बचपन में टीबी का मरीज़ जैसा दिखने वाला शरीफ अब थाइराइड के पेशेंट की तरह मोटा ताज़ा हो गया।

नूर मोहम्मद अपनी बेग़म से मिले ग़म को ग़ुम करने की गरज से जब शरीफ के घर पहुंचे उस समय उनके ड्राइंगरूम में कई पहुंचे हुए लोग पहले से पंहुंचे हुए थे। बीच के सोफे पर बड़े मौलाना, और अन्य कुर्सियों पर उनके उपमौलानों का जमावड़ा था। बड़े मौलाना की पेशानी (मत्था) इस कदर स्याह (काली) थी कि उन्हें देखकर लगता था कि वे नवाज़ के अलावा कुछ पढ़ते ही नहीं है। उनके सामने एक प्लेट में भुने हुए काजू और दूसरी प्लेट में खजूर रखे थे। नूर मोहम्मद के अंदर आते ही वार्ता बंद हो गयी। शरीफ ने सबसे नूर मोहम्मद का परिचय कराया और एक कुर्सी जिसपर मौलाना साहब का रिवाल्वर रखा था उसे काजू की प्लेट के बगल में रख कर बैठने का इशारा किया। नूर मोहम्मद चुपचाप कुर्सी पर तशरीफ़ रख दिए।

मौलाना साहब ने फिर बोलना प्रारम्भ कर दिया, नूर मोहम्मद के पास सुनने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था। मौलाना साहब जिस भाषा में बोल रहे थे उसे न तो हिन्दी और न ही उर्दू कहा जा सकता था, बल्कि अरबी और फारसी की कोई बाय प्रोडक्ट टाइप की भाषा में उनकी तक़रीर जारी थी। हर आठ शब्द के बाद इंशाअल्लाह, दो मिनट बाद काफ़िर, ढाई मिनट बाद जिहाद, और तीन मिनट बाद इस्लाम पर खतरा के अतिरिक्त नूर मोहम्मद को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। चूंकि कुछ समझ में नहीं आ रहा था इसलिए वे मौलाना साहब को बहुत विद्वान समझने लगे, और उनकी तकरीर बड़ी श्रद्धा से सुनने लगे। संभवतः तकरीर को श्रद्धा से सुनने का एक और कारण था कि उनके सामने मेज पर खाने के तीन ऑप्शन मौजूद थे काजू, खजूर और गोली।

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थोड़ी देर तकरीर बर्दाश्त करने के बाद नूर मोहम्मद को एहसास हुआ कि मौलाना की धार्मिक तकरीर में तकरीर कम तकरार ज़्यादा है। इस पर इस्लाम नहीं सवार है बल्कि यह स्वयं इस्लाम पर सवार है। अगर इसकी सब बातें यथावत मान ली जाएं तो जन्नत हासिल करना कोई मुश्किल काम नहीं है। उन्हें लगे हाथों इस बात का भी अहसास हुआ कि अगर वह इनके हाँथ लग गया तो ये कमर में बम बंधवाकर बहत्तर हूरों से रूबरू करा देगा। उन्हें यह ज्ञान भी हासिल हुआ कि कोई किसी को बिना कारण के नहीं मरता बल्कि मरने के लिए भी तमाम प्रयास करने पड़ते है। मौलाना की तकरीर का यदि अर्क निकाला जाए तो यह बात सामने आ रही थी कि मर जाना व्यक्ति की बुनियादी ज़रुरत है।

नूर मोहम्मद के सामने असमंजस की स्थिति थी एक तरफ मौलाना था जिसके बताये रास्ते पर चलकर एक मुश्त जन्नत मिल सकती थी और दूसरी तरफ नसरीन बेग़म थी जो किश्तों में जहन्नुम का अहसास करा रही थीं। मौलाना के पास अपार ज्ञान था क्योंकि वह पूरी दुनिया घूम चुका था जबकि नसरीन अज्ञानी होते हुए भी उसकी दुनिया घुमाये जा रही थी।

शरीफ कुरैशी को तलाक का तज़रुबा था, उसने कई तलाक दिए थे इसलिए नूर मोहम्मद उनसे राय लेने और तरीका-ए-तलाक समझने की गरज से आये थे लेकिन यहाँ स्थितियां बिलकुल अलग थी। यहां तलाक की चर्चा करना उचित नहीं था। वहां पर बोलने का अधिकार केवल बड़े मौलाना को ही था। उन्हें केवल कान का उपयोग करने की छूट थी, चूंकि वे कान से नहीं बोल पाते थे इसलिए चुपचाप बाहर आ गए।

सामने से अब्दुल मियाँ आते दिखाई दिए। कई साल पहले उनकी बीवी को इंद्रजीत पाठक बिना तलाक दिलाये मुम्बई भगा ले गया था। अब अब्दुल मियाँ अकेले ही रहते हैं। वे हिन्दू धर्म के अच्छे जानकार हैं। राष्ट्रीय एकता के प्रबल पैरोकारों में उनकी गिनती होती हैं।मस्जिद में अजान देना उनका मुख्य कार्य है। मुसलमानों में उनका कोई सम्मान नहीं है, वैसे सम्मान तो हिंदुओं में भी नहीं है, लेकिन रामलीला के सीजन में उनकी डिमांड बढ़ जाती है। रामलीला वाले नकली दाढी का खर्च बचाने के चक्कर में उनसे विश्वामित्र का अभिनय कराते है। चूंकि वे हिंदुओं की रामलीला में विश्वामित्र का अभिनय करते हैं, इसलिए कई मुसलमान उन्हें विभीषण समझते हैं। रामलीला के ही चक्कर में उन्हें अपनी बीवी से भी हाँथ धोना पड़ा।  एक बार ये रामलीला में सीता हरण का दृश्य देखने में इस कदर भाव विभोर हो गए कि घर की फ़िक्र न रही। इंद्रजीत पाठक जो कि रावण का अभिनय कर रहे थे सीता माता को अशोक वाटिका छोड़कर सीधे अब्दुल मियाँ के घर मोटर साईकिल से पंहुच गए, जहां फरजाना पहले से तैयार बैठी थी, फिर दोनों ने एक साथ फिल्मों में काम करने की कसमें खाईं और मुम्बई की ओर निकल गए। इधर इंद्रजीत पाठक के हिस्से का बचा रावण का अभिनय अब्दुल मियाँ को करना पड़ा और उधर अब्दुल मियाँ का रोल इंद्रजीत पाठक को।

इस घटना को कुछ मुसलमानों ने ज़ोर शोर उठाने का प्रयास किया, उन्हें इस मुद्दे पर दंगा भड़काने की पूरी संभावनाएं दिखीं, लेकिन जब उन्हें यह जानकारी हुई की उस मोटर साईकिल में पेट्रोल अब्दुल मियाँ ने ही भराया था, तो मामला ठंडा पड़ गया।

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पास आकर अब्दुल मियाँ ने नूर मोहम्मद के हाल-चाल मुंह के बजाय भौहों के माध्यम से पूछे, इन्होंने भी सौ ग्राम की जीभ की जगह चार किलो का सर हिलाकर उसका उत्तर दिया, किन्तु उत्तर इतना डिप्लोमेटिक था कि अब्दुल मिंयां समझ नहीं पाए हाल चाल अच्छे हैं, या बुरे। हालांकि उन्हें इसकी ज़रुरत भी नहीं थी बात प्रारम्भ करने की इस अंतर्राष्ट्रीय परम्परा का उन्होंने निर्वाह मात्र ही किया था। इस बार उन्होंने हाँथ के इशारे से ये पूछना चाहा कि कहाँ से आ रहे हो? नूर मोहम्मद ने चहरे पर शराफत लाकर इशारे से बताया शरीफ के घर से।

अब्दुल मिंयां इस बार भी कुछ नहीं समझ पाए, इसलिए विवश होकर उन्हें मुँह का प्रयोग करना पड़ा, “कहाँ से आ रहे है जनाब?”

“शरीफ के घर गया था, मगर वहाँ तो कोई मौलाना आये हुए हैं, जो खुदकशी के नए-नए तरीके बता रहे हैं। उनकी बातों से तो ऐसा लग रहा है कि अगर मुसलमान होते हुए भी कोई ज़िंदा रहे, तो उसे काफ़िर समझिये। हालांकि ये बात वो ज़िंदा होते हुए ही समझा रहे थे।” नूर मोहम्मद ने एक घंटे पूर्व मिले समस्त ज्ञान की समरी प्रस्तुत कर दी।

अब्दुल मिंयां ने अपना ज्ञान बघारा, “अरे वो सिराज मौलवी होगा। चार चमचे लिए घूमता रहता है, शरीफ का खालू ऑब्लिक ससुर है वो। अपने आप को जिहादी समझता है। पूरा पाकिस्तानी है साला। बाहर मुल्क से पैसा लेकर यहां के लोगो को गुमराह करता है। उसके चक्कर में पड़ना भी नहीं। बम बंधवाकर कर तुम्हे दगा देगा।”

नूर मोहम्मद ने ढेर सारी ऑक्सीजन खींचकर धीरे-धीरे कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते हुए कहा, “मुझे क्या दगायेगा मैं खुद उसे दगा दे आया। मैं अपनी परेशानी में परेशान हूँ वो अपनी झोंक रहा था।”

अब्दुल मिंयां ने अपने प्रिय विषय राष्ट्रीय एकता पर भाषण झाड़ा, “यहाँ इतना चैन ओ अमन है सब मिल जुल कर रहते है, मगर ये आ गया है, अब देखना।”

नूर मोहम्मद को राष्ट्रीय एकता विषय में कोई दिलचस्पी नहीं थी, उबासी लेते हुए बोले, “मैं खुद अपने घर से परेशान हूँ।”

अब्दुल मिंयां को उनके घर के मामले में कोई दिलचस्पी थी अतः मुद्दे को फिर राष्ट्रीय एकता से जोड़ने का प्रयास किया, “मिल जुलकर रहना चाहिए, क्या रखा है इस दंगा फसाद में। ये झगड़ा कराकर निकल लेंगे, हमें यहीं रहना है, सबके साथ। ये मुल्क हिन्दू, मुसलमान सब का है।”

नूर मोहम्मद ने फिर से बात को अपनी ओर मोड़ने का प्रयास किया, “मुल्क की छोड़िये जनाब, अपने घर पर अपना ज़ोर नहीं है।”

अब्दुल मिंयां बात को राष्ट्रीय स्तर का बना रहे थे जबकि नूर मोहम्मद वार्ता को अपने घर तक खींच कर संकुचित करने का प्रयास कर रहे थे। अब्दुल मिंयां ने एक और  ज़ोर लगाया, “इन्ही जैसे लोगों की वजह से मुसलमान आज अलग-थलग पड़ा है, उसको बार-बार वतन परस्त होने का सबूत पेश करना होता है। फिर भी उसपर कोई यकीन नहीं करता।”

नूर मोहम्मद ने बात को फिर से मोड़ने का प्रयास किया, “यकीन तो अपनी बीवी भी नहीं करती शौहर पर।”

अब्दुल मिंयां को गुस्सा आ गया, “क्या बीवी का रोना लेकर बैठे हो। मैं बड़े फलक की बात कर रहा हूँ तुम गुफ्तगू को अपने घर में घुसेड़ दे रहे हो।”

अब नूर मोहम्मद को भी क्रोध आ चुका था, “जिसकी बीवी भाग जाती है उसका फलक बड़ा ही हो जाता है।”

अब्दुल मिंयां को ये उम्मीद नहीं थी कि नूर मोहम्मद बात को इतना व्यक्तिगत बना देगा। सफाई देते हुए बोले, “वो साला इन्द्रजीत पाठक गद्दारी कर गया वर्ना…”

“…वर्ना तुम कौन सा जिल्लेइलाही बन जाते। रामलीला में तुम्हारे हाँथ में कमंडल पकड़ाकर खुद फरजाना का हाँथ पकड़ कर निकल लिया। तुम यहां अलाप ही लेते रहे, उधर वो पूरा गाना गा गया।” नूर मोहम्मद ने अपनी खीज उतारते हुए कहा।

अब्दुल मिंयां वाकायदे खिसिया चुके थे, कोई सटीक जवाब उनके पास नहीं था, घड़ी देखते हुए बोले, “तुम साले नाली के कीड़े हो रोज औरत के जूते खाते हो और हमसे काबिलियत झाड़ रहे हो। अजान देने का वक्त हो गया है, मस्ज़िद जा रहा हूँ, इसलिए चुप हूँ।”

नूर मोहम्मद जाते-जाते बोले, “हाँ जाओ तुम्हारे लिए वही ठीक है। तुम क्या जानो घर गृहस्ती क्या होती है।”

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घर पहुँच कर नूर मोहम्मद ने पाया कि नसरीन बेगम दरवाज़े पर ही खड़ी हैं। उनके शरीर के आकार और दरवाज़े के प्रकार के हिसाब से किसी के भी अंदर घुसने की गुंजाइश नहीं थी। गले में खरास न होने के बावजूद  नूर मोहम्मद ने खखार कर गला साफ़ किया। जिसका अस्पष्ट आशय था कि हटो तो मैं अंदर जाऊं, एक हिसाब से उन्होंने हॉर्न बजाकर साइड माँगी। लड़ाई सुबह हुई थी ज़रा सा बोल देने पर सुलह के पूरे आसार थे, लेकिन मर्द का सारा दम्भ पत्नी के सामने ही जागृत होता है, इसलिए कुछ भी हो जाए वे पहले बोलकर मर्दों की जमात से खारिज होना नहीं चाहते थे।

किसी भी धर्म, जाति या वर्ग की हो, नारी ही झुकती है, इस सिद्धांत के तहत नसरीन बेगम को बोलना पड़ा, “हाँथ मुँह धो लो तो खाना गर्म कर दें। या जानवर की तरह ऐसे ही खाओगे?”

सुबह की मार के कारण जबड़ा अभी भी दर्द कर रहा था इसलिए कुछ और बोलकर नयी पीड़ा को अफोर्ड करने की स्थिति में नहीं थे, बोले, “गर्म करो बस आया।”

“अब कहाँ मरने जा रहे हो।” नसरीन चिल्लाई।

“हाँथ मुँह धोने।” उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिया।

नसरीन तौलिया लेकर हैण्ड पम्प आ गयी, और उसे चलाने लगी। हाँथ पैर धोते समय नूर मोहम्मद को सोचने लगे कि पारिवारिक मामले में कोई भी मदद नहीं कर सकता, न बचपन का मित्र शरीफ, न धर्म के ठेकेदार मौलाना साहब, न ही अब्दुल मिंयां के जैसे कौमी एक्जहती के अलंबरदार, इसे तो खुद ही समझना पड़ेगा। मैं अगर टेढ़ा जवाब न देता होता तो बात इतना न बिगड़ती। गर्म चपातियों, घर की देखरेख और इस कदर गुलामी की हद तक काम कराने के एवज में कुछ तो……. क्या वास्तव में मर्द होने के कारण अपने को श्रेष्ठ और बड़ा सिद्ध करना ही सारी कलह की जड़ है?

दूर मस्ज़िद के लाऊड स्पीकर से अब्दुल मिंयां चीख-चीख कर बता रहे थे, “अल्ला हू अकबर” यानी ईश्वर ही सबसे बड़ा है।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

मेरी पुस्तक #theपण्डितजी से…

आला (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

कन्नौजिया मास्टर सोफे पर कुछ इस तरह से विद्यमान थे कि उन्हें देखकर ठीक-ठीक अनुमान लगाना कठिन था कि वे बैठे हैं, या लेटे हैं। बैठने और लेटने के बीच की एक नयी किस्म की वैराइटी उन्होंने ईजाद की थी। जिस अवस्था मे वे इस समय अवस्थित थे, उस स्थिति में सोया भी जा सकता था, और खाया भी। उनके बैठने के तरीके से ऐसा जान पड़ रहा था कि वे जानबूझ कर शरीर का भार उन अंगों पर डाल रहे हैं, जिनका प्रयोग प्रायः बैठने के लिए नही किया जाता है। जिन अंगों के सहारे बैठने का चलन सदियों से प्रचलित है वे उसके प्रयोग से परहेज करते से प्रतीत हो रहे थे। चेहरे का निर्विकार भाव देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें संसार की नश्वरता का भान हो चुका है। पलकों के अलावा शरीर का कोई भी वाह्य अंग इस समय एक्टिवेट नही दिख रहा था। अगर कम्प्यूटर की भाषा मे कहा जाए तो उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वे हैंग हो गए हैं।

ऐसा पहली बार हुआ था, इसलिए घर के लोग अभी अभ्यस्त नही हुए थे, सभी चिंतित थे। इस नए प्रकार के रोग का कोई स्पेशलिस्ट डॉक्टर भी गांव में न था। एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र था, जिसमे ले दे कर एक ही डॉक्टर था, जिनसे गांव के लोग दे ले कर इलाज कराते थे। डॉ. तेग बहादुर कालरा, जिन्हें तिरस्कार से सब टी.बी. कालरा कहते थे, गांव को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी सरकार ने उन्ही को कंधे पर डाल रखी थी। सरकारी दवा देने के मामले में वे किसी भी प्रकार का भेदभाव नही करते थे। कोई भी रोग हो वे दवा एक ही प्रकार की देते थे। मरीज के ठीक होने की ज़िम्मेदारी सरकार और दवाओं की रहती थी। गाँव के लोग उन्हें आला दर्जे का डॉक्टर मानते थे, क्योंकि पूरे गाँव मे एक मात्र वे ही थे, जिनके पास आला था।

कन्नौजिया मास्टर अस्पताल जाने की स्थिति में नही थे। उनका वजन भी डॉक्टर टी.बी. कालरा से अधिक था, अतः तमाम विचार विमर्श के बाद घर के लोगों ने यह निर्णय लिया कि डॉक्टर साहब को घर लाना अधिक आसान है, और उन्हें ले आये। डॉक्टर साहब ने पहले कन्नौजिया मास्टर के शरीर का हवाई सर्वेक्षण किया, फिर कुछ देर के लिए उनकी नब्ज पकड़ी। उन्हें सब कुछ सामान्य सा लगा। अचानक उन्हें आभास हुआ कि जो उपकरण उनके गले मे लटक रहा है, दरअसल वह टाई नही, आला है, अतः एक बार इसका भी प्रयोग कर लेना उचित रहेगा। उस समय गांव मे पैथालॉजी के नाम पर आला ही एक ऐसा उपकरण था जो शरीर की सारी जांचें कर लेता था। कन्नौजिया मास्टर के विभिन्न अंगों पर थोड़ी-थोड़ी देर आला रख कर डॉक्टर कालरा ने कुछ सुनने का प्रयास किया। उन्हें अहसास होने लगा कि सारी डॉक्टरी की पढ़ाई व्यर्थ चली गयी। देखने मे अच्छा खासा बीमार आदमी चेक करने पर अच्छा खासा लग रहा है, बीमार नही। सारे लक्षण एक महास्वस्थ व्यक्ति के है।

“कहो भाई उतरी या नही?” कहते हुए देवी दीन दुबे अंदर दाखिल हुए।

“क्या??????” लगभग सभी एक साथ कोरसनुमा बोले।

“भांग और क्या? अरे बहुत तगड़ी पिये है।” कहते हुए दुबे जी बैठ गए।

एक दम से डॉक्टर टी.बी. कालरा चिल्लाए, “तो उतनी देर से मेरा समय क्यों खराब कर रहे हो। पहले बताना चाहिए था।”

“पहले? अरे पहले कैसे बताते? जब पियेंगे तभी तो बताएंगे। आप भी डॉक्टर साहब अंधेर किये हो। आपके पास तो ये मशीन है, ये नही बताई? सब फर्जी ही भौकाल है क्या?” दुबे जी ने डॉक्टर कालरा के गले मे लटके आले पर कटाक्ष किया।

डॉक्टर साहब ने बहस करने की बजाय वहां से निकलना बेहतर समझा, और चले गए।

“तो क्या अब ये ऐसे ही रहेंगे हमेशा? या थोड़ा बहुत ठीक भी होंगे?” इसबार कन्नौजिया मास्टर का लड़का छुट्टन बोला।

“ठीक हो जाएंगे, ऐसा करो इनके कानों में सरसों का तेल डालो।”

दुबे जी का बताया उपचार काम आया। पहली बार कन्नौजिया मास्टर बोले, “अबे चौदह पंचे सत्तर होता है।”

दुबे जी किसी कुशल उपचारक की भांति बोले, “स्मृतियां वापस आएंगी, थोड़ा समय लगेगा। अभी ये स्कूल में पढ़ा रहे है, कान में तेल डालते रहो घर भी आ जाएंगे। मैं जा रहा हूँ, कोई दिक्कत हो तो बताना। ये डॉक्टर, फाक्टर, कालरा, हैजा के चक्कर मे मत पड़ना।”

दुबे जी के जाने के बाद छुट्टन ने उनके कानों में फिर तेल डाला। कन्नौजिया मास्टर फिर बोले, “उन्नीस दूना अड़तीस, उन्नीस तियाँ सत्तावन, उन्नीस चौके…”

कन्नौजिया मास्टर को घर तक लाने में छुट्टन का डेढ़ लीटर सरसों का तेल लगा।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

प्रेमपत्र (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

अन्य कापियों की अपेक्षा भूगोल की कॉपी थोड़ी लम्बी होती थी, इसलिए प्रेमपत्र लिखने के लिए उसके पन्ने बड़े मुफीद माने जाते थे उनदिनों। मुजीब ने उसी कॉपी से एक पेज फाड़ा किन्तु इश्क के चक्कर मे यह ध्यान भी नही दिया कि दो पन्ने एक मे ही जुड़े होते है और दूसरे पेज में विश्व का मानचित्र बना है, उसने भी उनका साथ छोड़ दिया है। चूंकि उस समय तक स्मार्ट फोन का अविष्कार नही हो पाया था, इसलिए आशिक अपनी भावना सिर्फ लिखा-पढ़ी में ही व्यक्त करते थे। आमने-सामने आई लव यू बोलने का चलन सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित था।

“खून से लिखा है स्याही न समझना” नामक अमर शेर से पत्र की धुंआधार शुरुआत करने के बाद मुजीब ने अपने दिल की बेकरारी पर प्रकाश डालते हुए प्यार की जीवन मे उपयोगिता एवं समाज की दखलंदाजी का तुलनात्मक अध्ययन किया। डायग्राम के तौर पर एक पान बनाया और उसमे एक तीर घुसेड़ दिया। प्यार के दुश्मनों के हथकंडे, सच्चे प्यार की परिभाषा के साथ कोटेशन में चार शेर, फिर भविष्य के सपने, प्यार न मिल पाने के दुष्परिणाम और जीवन की नश्वरता पर आख्यान देते हुए अंत मे “फूल है गुलाब का खराब न करो, टाइम हो तो छुट्टी के बाद तालाब के किनारे मिलो” से पत्र समाप्त किया। पेज दोनों तरफ इस कदर भर गया था कि तिल रखने की भी जगह न थी। किसी तरह हिलाकर और दबाकर थोड़ी सी जगह का जुगाड़ करके उसमें नाम मुजीब अहमद रोल नंबर सत्रह कक्षा पांच लिख कर पत्र समाप्त करना पड़ा।

अब मुजीब के आगे समस्या यह खड़ी हुई कि इसे कैसे और किस को दिया जाए। वह अंदर-अंदर अनेकों को प्यार करता था, किन्तु पत्र मात्र एक था। कन्नौजिया मास्टर के कलम की लाल इंक भी समाप्त हो चुकी थी, इंक चुराने जाने पर पेन की चोरी भी पकड़ी जाने का खतरा था। मजबूरी में उसे एक ही पत्र से संतोष करना पड़ रहा था। पत्र को एक पत्थर में बांधकर अपने अंतःकरण में मजनू, फरहाद आदि इश्क के इष्टों का स्मरण करते हुए मुजीब ने उसे कन्या विद्यालय के अंदर फेंक दिया। पत्थर ने अन्दर पँहुचते ही फ़ौरन अपनी उपस्थिति दर्ज की, एक दम से अंदर चिल्लाहट मच गई। लड़कियों के रोने और पकड़ो-पकड़ो की आवाज़ सुनकर मुजीब अपने घर की तरफ भागा।

अगले दिन कन्नौजिया मास्टर कक्षा पांच के बच्चों को पत्रों के प्रकार और उनके लिखने का तरीका सिखा रहे थे, ठीक उसी समय कन्या विद्यालय की प्रधानाचार्या उनकी कक्षा में आ गयीं। और कन्नौजिया मास्टर की मेज पर मुजीब वाली चिट्ठी रखते हुए बोली, “ये लीजिये मास्टर साहब प्रेम पत्र।”

कन्नौजिया मास्टर एक दम से सकपका गए, शर्माते हुए बोले, “अरे खुले आम मत दीजिये। माना कि मैं भी आपको पसंद करता हूँ, पर बच्चों के सामने ये उचित नही है।”

(चित्र गूगल से साभार)

प्रधानाचार्या का क्रोध अब सातवें आसमान पर था, बोलीं, “मज़ाक मत कीजिये, ये पढ़ाते हैं आप? तुम्हारे प्यार में दीवाना हुआ जाता हूँ, तुम शम्मा हो मैं परवाना हुआ जाता हूँ।”

“नही ये तो नही पढ़ाता। ये तो बच्चे अपने आप पढ़ लेते है कहीं से।” कहते हुए उन्होंने वह पर्चा उठा लिया। एक सांस पूरा पढ़कर बोले, “मुजीब इधर आओ। एक पन्ने में साठ गलती? मूर्ख कहीं के। ये पकड़ो और बीस बार सही सही लिखकर लाओ। अगर अब गलती हुई तो एक गलती पर पाँच डंडे का दंड मिलेगा।”

प्रधानाचार्या क्रोध से फुफकारते हुए बोलीं, “श्रीमान जी यह प्रेमपत्र है। आपको इमला सिखाना चाहिए लेकिन आप विमला, कमला, निर्मला सिखाते हैं, हद्द है आपसे तो बात करना ही बेकार है। मैं इस मुद्दे को ऊपर तक उठाऊंगी।” कहकर वे जितनी स्पीड से आयी थीं, उससे तेज गति में चली गयीं।

कन्नौजिया मास्टर की कुछ समझ मे नही आ रहा था कि इस मामले को कैसे डील करें। प्रेम करने की सजा देकर बच्चों को नफ़रत सिखाएं अथवा फिल्मों आदि के ज़रिए आये इस विष का छोटे बच्चों पर असर देखकर मातम मनायें। उन्होंने मुजीब को अपने पास बुलाकर पूछा, “ये शायरी किसने लिखायी?”

इससे पहले मुजीब कुछ बोलता कल्लन उसके बस्ते से कन्नौजिया मास्टर का पेन और एक पतली सी किताब उठा लाया, जिसपर लिखा था “मुहब्बत की धुंआधार सौ शायरी” मूल्य पांच रुपये।

कन्नौजिया मास्टर ने पेन जेब के हवाले किया, शायरी की किताब और मुजीब को लेकर खुली जगह में नीम के पेड़ के नीचे चले गए।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

बाबागिरी

छंगा उनका ओरिजिनल नाम नही था, लेकिन कहते सब उन्हें छंगा ही थे। यहां तक कि राशन कार्ड और वोटर आईडी भी इसी नाम से बन गयी थी। केवल हाईस्कूल फेल की मार्कशीट के अनुसार उनका नाम विद्या प्रकाश था। हाईस्कूल पास होने के कोई फायदे हों या न हों पर छंगा को हाईस्कूल फेल होने से इतना फायदा ज़रूर हुआ था कि किसी सरकारी अभिलेख में उनका असली नाम और जन्म तिथि दर्ज हो गई थी। उनके पास अलग-अलग वर्षों की हाईस्कूल फेल की कुल सात मार्कशीट थीं, आठ विषयों में से पाँच अलग-अलग विषय मे वे प्रतिवर्ष उत्तीर्ण हो जाते थे, किन्तु सभी विषयों में एक मुश्त कभी न उत्तीर्ण हो पाए। अगर उनकी सातों मार्कशीट का एक साथ अध्ययन किया जाएं तो ऐसा कोई भी विषय नही था जिसे उन्होंने कम से कम तीन बार उत्तीर्ण न किया हो, इसके बावजूद उन्हें हाईस्कूल पास होने का गौरव नही हासिल हुआ था।

गूगल से साभार

अध्यापकों की उम्र जब छात्र की उम्र से कम लगने लगे तब विद्या का मोह त्याग देना चाहिए, इस सिद्धान्त का पालन करते हुए अंततः विद्या प्रकाश उर्फ छंगा ने विद्यालय छोड़ दिया। नौकरी के लिए इतनी पढ़ाई पर्याप्त न थी, अतः उन्होंने कुछ विजनेस करने का मन बनाया। रात को मुंह ढक कर हाइवे पर चले जाते और सुबह मालामाल होकर घर आते। इस व्यापार के चलते उनकी बदमाशों और पुलिस दोनों में अच्छी पकड़ हो गयी। उनके इस व्यापार में साल के छः महीने ही काम करना पड़ता, शेष छः माह के भोजन का प्रबन्ध करने की ज़िम्मेदारी सरकार ने उठा रखी थी जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ता था। कचेहरी के लगभग सभी वकील उन्हें जानते थे। कानून की धाराओं पर कोर्ट में वे धाराप्रवाह ऐसा बोलते कि वकील और जज दोनों मुंह ताकते रह जाते।


वैसे तो छंगा ने स्थाई तौर पर घर नही बसाया था लेकिन अस्थाई रूप से उनके चार-पांच मामले चर्चा में थे। छंगा को विवाह की प्रबल इच्छा थी। उनका मानना था कि जेल और ढाबों की मुफ्त की रोटी से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। कोई तो हो जो चिमटे से पकड़ कर फूली-फूली रोटी उनकी थाली में डालते हुए एक और खाने का आग्रह करे। सुबह चाय पीने के लिए नुक्कड़ की दुकान पर जाते-जाते वर्षों बीत गए कोई तो हो जो अपनी भीगी हुई जुल्फों से पानी छटक कर इन्हें जगाए। शाम को घर आकर ताला खोलना उन्हें अब खलने लगा कोई ऐसा हो जो दरवाजे की ओट से उनका इंतजार करे और विलंब से आने के कारण उन्हें डांटे। छंगा ने शादी करने का पूरी तरह मन बना किया। विवाह के लिए सब कुछ तैयार था अगर कुछ कमी थी तो वह बस एक अदद कन्या की। उनकी छवि ऐसी थी कि विवाह तो दूर की बात मंगनी का ‘म’ तक उन पर सूट नही करता था। बदमाशों के कन्याएं नही होती और शरीफ आदमी उन्हें कन्या देना नही चाहता था। कुल मिलाकर समस्या वाकई गंभीर थी। उनके जो चार-पांच अस्थाई मामले थे वे पहले से शादीशुदा होने के साथ-साथ पुनर्विवाह के घोर विरोधी भी थे।

छंगा के चरित्र एवं कृत्य से असंतुष्ट खानदान व परिवार के लोगों ने पहले ही उनसे संबंध समाप्त कर लिए थे। उनका अब छंगा से कोई लेना-देना नही था। माली हालत के मामले में छंगा मजबूत थे। छंगा के विवाह की पैरवी के लिए कोई जब खड़ा नही हुआ तो छंगा ने स्वयं यह बीड़ा उठा लिया।

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स्वामी चंदानन्द से छंगा की मित्रता काफी पुरानी थी। दोनों की मुलाकात जेल में हुई थी। चंदानन्द तब तक सन्यासी नही हुए थे उस समय वे बलात्कार के आरोप में जेल में सजा काट रहे थे। तब उनका नाम चन्दू चोर हुआ करता था। सात साल की सजा ने उन्हें सन्यासी बना दिया। सजा के दौरान उन्होंने न तो दाढ़ी काटी न बाल। बाहर निकल कर अपना आश्रम खोल लिया। तमाम चेले-चेलियां बन गए। अब उन्हें खुले आम चोरी और बलात्कार करने की आवश्यकता ही नही महसूस होती। व्यक्ति और कृत्य वही होने के बावजूद उसका अर्थ बदल चुका था।असली धर्म वही होता है जो कुकृत्यों को सुकृत्य में परिवर्तित कर दे। यह बात स्वामी चंदानन्द को देख कर अनुभव की जा सकती थी।

स्वामी चंदानन्द ने अपने मित्र छंगा का भव्य स्वागत किया बिल्कुल ‘पानी परात को हाथ छुयो नही’ वाली स्टाइल में। छंगा को भी इतनी इज़्ज़त कभी मिली नही थी तो अपच सी होने लगी। उसने धीरे से चंदानन्द के कान के पास मुंह लाकर पूछा- “गुरू ये थोबड़े से मुखारबिन्दु तक का सफर कैसे तय किया?”

चंदानन्द ने अपने दाएं-बाएं देखा फिर धीरे से बोले- “यहां जेल वाला मामला न खोलना। यहां के लोगों में प्रचिलित है कि मैं सात वर्षों तक हिमालय में तपस्या कर रहा था। बड़ी सुनियोजित तरीके से मैंने इन लोगों में यह खबर फैलाई है।”

छंगा स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझते थे, लेकिन चन्दू को अपने से मीलों आगे पाया। बोले- “लेकिन आश्रम का आइडिया आया कैसे?”

चंदानन्द बोले- “अब बुढापे में चोरी-चकारी अपने बस की थी नही। पत्नी पहले ही भाग गई थी। सबसे आसान और आनन्द का यही धंधा लगा। बड़े-बड़े मंत्री, विधायक आगे-पीछे घूमते है, सालों का नंबर दो का पैसा होता है, कुछ अंश हमे देकर उनका भी धन पवित्र हो जाता है। तुम बस ये समझो कि अब डकैतों को लूटने की मशीन है धर्म। मैं तो कहता हूँ कि तुम भी इसी में कूद जाओ।”

छंगा आश्चर्यचकित भाव से सुन रहे थे, तपाक से बोले- “महाराज चेला बना लो अपना। बस एक बढ़िया चेली से विवाह करा दो, बांकी ज़िन्दगी आश्रम में झाड़ू पोछा में काट दूंगा।”

चंदानन्द ने चेहरे पर पुनः निर्विकार भाव लाते हुए कहा- “विवाह? मूर्ख हो क्या? मैं तुम्हे बाल ब्रह्मचारी घोषित करके नए आश्रम का मठाधीश बनाने की सोच रहा हूँ तुम साले वही मिडिल क्लास सोच में फंसे हो। कितना पढ़े हो?”

छंगा पूरी तरह दबाव में आ चुके थे, धीरे से बोले- “हाईस्कूल फेल हैं।”

“बहुत है इतना। आज शाम को प्रवचन के दौरान तुम्हे उतार देता हूँ इस फील्ड में। अंदर नकली दाढ़ी मूछे रखी हैं लगा लेना। जबतक असली नही आ जाती नकली से काम चलाओ। बस इतना ध्यान रहे कुटिलता अंदर ही रहे, बाहर से सज्जनता टपकनी चाहिए।”- कह कर चंदानन्द चले गए।

छंगा को लगा कि आज से नए कैरियर की शुरुआत हो रही है। जिसमे धन भी है और सम्मान भी।

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हज़ारों की संख्या में भक्तों से भरे पांडाल में एक ऊंचे मंच पर स्वामी चंदानन्द विराजमान थे। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी और धूर्ततानिष्ठ भक्ति में उन्होंने डेढ़ घंटे प्रवचन दिया। फिर अचानक आसन से उठ खड़े हुए और मंच के कोने में नकली दाढ़ी मूछ लगाए भगवा परिधान में बैठे छंगा के पास जाकर बोले- “आज सौभाग्य का विषय है हिमालय की वादियों में पैंतीस वर्षों तक कठिन तपस्या कर तमाम सिद्धियां अर्जित करने वाले स्वामी छंगानंद जी हमारे बीच आये है। आप को जानकर आश्चर्य होगा कि इनके हाथ मे छह उंगलियां जन्म से नही है। छठी उंगली और छठी ज्ञानेन्द्री इन्होंने अपने तप से विकसित की है। विगत बीस वर्षों से इन्होंने पूर्णमौन व्रत रखा हुआ है अभी चार वर्ष इनका पूर्णमौन व्रत और जारी रहेगा। पूर्णमौन व्रत बहुत कठिन साधना होती है। देवताओं को दुर्लभ है, ऐसा शास्त्रों में लिखा है। इसमें साधक अपने विचार किसी भी रूप में व्यक्त नही करता है।”

स्वामी चंदानन्द का इशारा पाकर छंगा अपने स्थान से उठखडे हुए और अपने चेहरे पर ईश्वर प्रदत्त धूर्तता पर कृतिम गंभीरता चिपकाते हुए सबको आशीर्वाद देने की मुद्रा में हाथ हिलाते हुए मंच के बीच मे आ गए।

दर्शकों ने अपने स्थान पर खड़े होकर अपने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। छंगा इतने प्रणाम एक साथ देखकर भावुक हो गए।

सभा समाप्त हो चुकी थी, भक्तगण धीरे-धीरे अपने-अपने घर जाने लगे। देखते ही देखते पांडाल खाली हो गया। रात्रि में स्वामी चंदानन्द छंगा से मिलने उनके कमरे में आये। उनके पीछे-पीछे एक साध्वीनुमा सेविका बड़ी सी ट्रे पकड़े हुए आई। ट्रे के ऊपर से आवरण हटाकर उसने उसे मेज पर रख दिया, फिर बिना कुछ बोले चुपचाप चली गयी। ट्रे में जो कुछ भी उसे देखकर छंगा की लार टपकने लगी। इतनी मंहगी शराब उसने कभी देखी भी नही थी। स्वामी चंदानन्द ने दो पैग बनाये और दूसरा वाला खुद पीने लगे। छंगा ने पहला पैग एक ही सांस में खींच लिया। उसके पीने के ढंग से ऐसा जान पड़ रहा था कि जैसे जन्मजन्मांतर का प्यासा हो। बिना किसी औपचारिकता के उसने स्वयं दूसरा पैग बनाया और उसे भी उसी गति से खींच कर प्लेट में रखे काजुओं के कुछ काजू अपने मुंह के हवाले करते हुए बोले – “मौनव्रत वाला नाटक कुछ ज़्यादा तगड़ा हो गया, आपने ऐसा क्यों किया?”

स्वामी चंदानन्द झिड़ककर बोले – “अबे बाबागीरी आसान समझते हो क्या। अगर शुरुआत में ही कुछ उल्टा सीधा बोल दिया तो जनता एक मिनट में बाबा से नाती बना देगी। अब चार साल तुम्हारी ट्रेनिंग होगी तब असली बाबा बनोगे।”

छंगा तीसरा पैग खींचते हुए बोले -“लेकिन चार साल चुप रहना पड़ेगा? ये किस झंझट में फंसा दिया आपने? चार साल में तो बुड्ढा हो जाऊंगा, तब ऐश क्या करूंगा, घण्टा।”
स्वामी चंदानन्द ने अपना दूसरा पैग समाप्त करके कहा – “अबे बोलकर कौन सा तुम तीर मार लेते। कुछ आता-जाता भी है तुम्हे। ये सब तुम्हारे लिए ही कर रहा हूँ। तुम्हे बहुत बड़ा सिद्ध महात्मा सिद्ध करना है। बाबागीरी में जो जितना बड़ा सिद्ध होता है वह उतना ही बड़ा गिद्ध होता है। बस तुम देखते जाओ।”

“अब देखने के अलावा आपने विकल्प भी कहाँ छोड़ा है मेरे पास। बहुत लम्बी-लम्बी छोड़ते हो यार, हद है। बता रहे थे छह ज्ञानेन्द्रियाँ है, एक विकसित की है। जबकि जुबान पर ताला मार कर चार खुद कर दी तुमने। इतना तो हम भी पढ़े है चन्दू भाई।” – कहते हुए छंगा को महसूस हुआ कि विदेशी शराब का नशा संकोच और औपचारिकताएं समाप्त कर देता है।

स्वामी चंदानन्द कीमती विदेशी सिगरेट छंगा की तरफ बढ़ाते हुए बोले- “तुम एक नंबर के गधे हो। साले इज्जत हज़म करना तुम्हारे बस की बात नही है। आज देखा हज़ारों लोगों ने एक साथ प्रणाम किया। कभी किसी ने नमस्ते तक नही किया होगा तुमसे। लेकिन कुत्ते को घी कहां पचता है। तुम बोल अच्छा लेते हो, कोर्ट-कचहरी कर चुके हो इसलिए मुझे लगा कि प्रवचन ठीक दोगे। लेकिन तुम साले नाली के कीड़े हो वहीं पड़े रहोगे। जाओ शादी-विवाह कर लो और जेल चले जाओ। जैसे मेरी बीवी भाग गई वैसे ही भाग जाएगी तुम्हारी भी। तब झुनझुना बजाना।”

“लेकिन…..”

“अबे क्या लेकिन? लोग छः साल पैसा खर्च करके डॉक्टरी की पढ़ाई करते है, ट्रेनिंग लेते है, तब भी डॉक्टरी नही चलती। तुम्हे चार साल में बिना कुछ किये पैसा, इज्जत सब मिल रही है तो ज्ञान पेल रहो मुझे।” – स्वामी चंदानन्द नाराज़ होते हुए बोले।

छंगा ने थोड़ी विनम्रता प्रदर्शित करते हुए कहा – “कोई दूसरा रास्ता नही है क्या?”

“है….दूसरा रास्ता भी है। अपना झोला-झंडा उठाओ, और निकल लो यहां से। दिखना नही यहां फिर कभी, ये याद रखना मैं खड़ाऊँ लकड़ी की पहनता हूँ।” – स्वामी चंदानन्द ने सिगरेट का लम्बा सुट्टा मारकर पूरा धुआं छंगा चेहरे पर उड़ेलते हुए कहा।

पांचवे पैग के बाद छंगा ने अपने आप को सातवें आसमान पर पाया, वहीं से घोषणा करने के अंदाज़ में बोले – “अब यहां से कहीं भी न जाऊंगा, स्वर्ग का सुख है यहां, लेकिन मौनव्रत वाला नाटक न चल पाएगा मुझसे। चन्दू भाई साफ बता देता हूँ आपको।”

“अबे इज्जत से बात करो मुझसे। स्वामी जी कहा करो मुझे। क्या बार-बार चन्दूभाई-चन्दूभाई लगा रखा है।” – इसबार स्वामी चंदानन्द वास्तव में नाराज़ होते हुए बोले।
छंगा को लगा कि पांच पैग विदेशी शराब पीने के बाद भी अगर वह जवाब न दे तो धिक्कार है ऐसी शराब और उसे पीने वाले को, अतः पूरी ऊर्जा से बोला – ” इज्जत और तुम्हारी? साले चन्दू चोर, बलात्कार की सजा में सात साल जेल में सड़े थे। आज मुझसे ज्ञान झाड़ रहे हो। जेल में इतनी बार तुम्हे मार खाने से बचाया, भूल गए।”

स्वामी चंदानन्द को पहली बार लगा कि छंगा को साधु बनाने का उनका निर्णय गलत था। जिसके सामने बड़े-बड़े पी.एच.डी. होल्डर हाथ जोड़कर खड़े रहते है, ये दसवीं फेल तू-तड़ाक से बात कर रहा है। इसबार उन्होंने स्वयं को संयत करते हुए प्रश्न किया – “अच्छा तो ठीक है, अब साफ-साफ बताओ कि तुम मुझसे चाहते क्या हो?”

छंगा को लगा कि निशाना ठीक बैठा है, महालुटेरे को लूटने का इससे अच्छा अवसर फिर न आएगा घोषणा की- “केवल पच्चीस लाख रुपये और एक सुन्दर चेली से शादी।”

“बस….. हम साले तुम्हे काजू की बर्फी खिलाना चाह रहे थे तुम गुड़ पर ही अटके पड़े हो। अभी तुम नशे में हो, और क्या-क्या चाहिए सुबह तक सोच लेना। सब मिलेगा, इतना मिलेगा कि जिसकी तुमने कल्पना भी नही की होगी, क्योंकि तुम मेरे राजदार हो। मैं रावण नही हूँ जो अपने राजदार को लात मारकर भगा दूं।” – कहते हुए स्वामी चंदानन्द चले गए।

छंगा को बोतल से गिलास में पैग बनाना झंझट का काम लगने लगा अतः उन्होंने सीधे बोतल को ही मुंह मे लगा लिया और तबतक पीते रहे जब तक पी सकते थे।

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सुबह आश्रम के गेट पर दहशत का माहौल था। गेट से कुछ दूरी पर एक बरगद का पेड़ था उस पेड़ पर किसी सन्यासी की लाश लटक रही थी। आश्रम और आसपास के लोगों ने जब पास जाकर देखा तो पता चला वे स्वामी छंगानंद महाराज है। जो हिमालय में बरगद न होने के कारण यहां लटकने आये थे। लाश की खबर जिंदा होने से तेज़ फैलती है, काफी लोग एकत्रित हो गए थे। पास में ही पुलिस चौकी थी इसलिए उन्हें भी आना पड़ा। पुलिस लाश को पेड़ से उतारकर पोस्टमार्टम के लिए ले जाने की व्यवस्था में लग गयी। उसी समय स्वामी चंदानन्द चार चमचों के साथ आ गए। धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाते हुए उन्होंने लाश के पांच चक्कर लगाए और अपने साथ लाये गुलाब के फूल छंगा के चरणों रखकर मुड़े ही थे कि साथ में आये एक चमचे ने जयकारा लगाया – बोलो स्वामी छंगानन्द महाराज की जय।

जयकारे का भीड़ ने पूरा समर्थन किया। जयकारे के शोर से एक फायदा यह भी हुआ कि जो लोग अभीतक नही आ पाए थे अथवा आकर चले गए थे वे सब आ गए।
स्वामी चंदानद ने हाथ के इशारे से भीड़ को शान्त होने का संकेत किया और बोले- “सन्त महात्माओं के संस्कार में पुलिस का क्या काम। पुलिस के लोगों से आग्रह है कि आप लोग जाइये। हम इनका अपने संत परंपरा से अंतिमसंस्कार करेंगे।”

दरोगा जी स्वामी चंदानन्द जी के पास आकर चिल्लाए -“ये हत्या का मामला है। ऐसे कैसे बिना पोस्टमार्टम के अंतिम संस्कार करोगे।”

“हत्या….? दिमाग खराब है आपका दरोगा जी? इन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया है। इस नश्वर शरीर को छोड़कर परम सत्ता को प्रस्थान किया है। इसे हत्या कहता है मूर्ख!”- स्वामी चंदानन्द ने ज्ञान बघारा।

“आपका मतलब आत्महत्या की है? पच्चीस साल से पुलिस में हूँ बाबाजी। इनकी जैसी पता नही कितनी लाशें देखीं है। मूर्ख न समझो, इन्हें मारकर यहां लटकाया गया है।” – दरोगा जी आवेश में चिल्लाए।

स्वामी जी शांत भाव से बोले -“अरे वाह! आप तो सर्वज्ञ हैं। जब आपको इतना सब मालूम है तो पोस्टमार्टम की क्या ज़रूरत। मैं तो आपको पुलिस समझ रहा था, आप तो अन्दर से ईश्वर निकले। वर्दीधारी ईश्वर। आपका शंख, चक्र, गदा, मुकुट कहां है भगवन। प्रणाम प्रभु।”

“जी हां… हत्या की गई है इनकी। कोई इन्हें मार कर यहां टांग गया है। अगर आत्महत्या की होती तो इनकी जुबान बाहर निकल आयी होती। सैकड़ों आत्महत्या के केस देखे हैं मैंने।” – दरोगा जी स्पष्टीकरण दिया।

इसबार स्वामी जी आवेश में चिल्लाए – “महामूर्ख हो तुम,हत्या है या आत्महत्या है ये तो स्वामी छंगानंद जी ही बेहतर बता पाएंगे। आप ऐसा करो उन्ही से जाकर पूछ आओ। पागलों की तरह बता रहे हो जुबान बाहर नही निकली है, कान अंदर नहीं घुसे है। कल ही मैंने प्रवचन में बताया था कि स्वामी छंगानन्द जी बीस साल से पूर्णमौन व्रत में थे। जिस व्यक्ति ने बीस साल जुबान का उपयोग ही न किया हो उसकी जुबान बाहर कैसे निकलेगी? और हाँ …. एक बात ध्यान रखिये इसे आत्महत्या कहकर छोटा न बनाइये। इन्होंने शरीर का त्याग किया है, जिसे शास्त्रों में प्रायोपवेशन कहा गया है।”

दरोगा जी ने देखा स्वामी जी को भीड़ का समर्थन प्राप्त है, बात बिगड़ने पर दंगा होने की स्थिति पैदा हो सकती थी। न चाहते हुए भी स्वामी जी से ससम्मान बोले – “देखिए स्वामी जी धर्म अपनी जगह है और कानून अपनी जगह। दोनों को एक में न मिलाइये। आप अपना काम करिये और कानून को अपना काम करने दीजिए। पोस्टमार्टम के बाद दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। इसमें आपको क्या आपत्ति हो सकती है।”

स्वामी जी को आभास हो गया कि दरोगा डर गया है अतः और ज़ोर से चिल्लाए – “आपत्ति क्यों नही होगी, किसी संत के शरीर के साथ चीड़-फाड़ हो ये हम बर्दाश्त नही करेंगे। स्वामी छंगानंद हिमालय से सीधे मेरे पास आये थे कल ही उनके मुखारबिन्दु को देखकर आभास हो रहा था जैसे उनकी इच्छा हो कि उनका शरीर को ग्यारह मन चंदन की लकड़ियों से हवन किया जाए। अतः आप संत की प्रतिज्ञा में बाधक न बनिये। ये आपके कानून का नही बल्कि हमारे धर्म का मसला है। अगर किसी अन्य धर्म का मामला होता तो क्या तुम उन्हें कानून की किताब दिखा पाते। ये भीड़ देख रहे हो…. मेरा निवेदन है कि आप इसे उग्र न करें। वरना फिर आप ज़िम्मेदार होंगे।”

दरोगा जी समझ गए कि चंदानन्द वाकई बहुत पंहुचा हुआ संत है। इस हत्या को इसने धार्मिक रंग देने का बड़ा सुनियोजित प्रयास किया है।

देखते ही देखते चिता तैयार हो गयी। दरोगा और तीन अनफिट सिपाहियों सहित पुलिस के केवल चार लोग थे और बाबा के समर्थक चार हज़ार, जो उग्र होने के लिए आमादा दिख रहे थे। शान्त रहने के अलावा उनके पास दूसरा विकल्प न था, जनता यदि उग्र हो जाती तो सारा पुलिसपना एक मिनट में उतर सकता था।

एकाएक चिता के पास आकर स्वामी चंदानन्द ने घोषणा की – “स्वामी छंगानंद जी चिता को मुखाग्नि उनके प्रिय शिष्य बाबू लंगड़ देंगे। शीघ्र ही चितास्थल पर स्वामी छंगानंद जी की बहुत बड़ी प्रतिमा लगायी जाएगी। प्रतिवर्ष आज के दिन यहां मेला लगेगा। चूंकि इस स्थान पर एक संत ने देहत्याग किया है अतः यह स्थान एक तीर्थ माना जायेगा। इस पूरी साढ़े सात एकड़ भूमि पर स्वामी छंगानंद का आश्रम बनेगा। जिसके मठाधीश बाबू लंगड़ जी होंगे। स्वामी छंगानंद जी के पूर्णमौन व्रत के बचे चार वर्षों का व्रत आज से बाबू लंगड़ धारण करेंगे। आज से इनका नाम स्वामी लंगड़ानंद महाराज है।”

दरोगा सतपाल असहाय खड़े चलचित्र की तरह सारी घटना देख रहे थे। उपस्थित होने के बावजूद उनका किसी भी प्रकार का कोई योगदान नही था। सारी दारोगागिरी लुप्त हो चुकी थी। इस बीच उन्होंने फोन पर उच्च अधिकारियों को पूरा घटनाक्रम बताया, और अधिक पुलिस बल की मांग भी की, लेकिन ऊपर से धार्मिक मामले में हस्तक्षेप न करने का आदेश मिल गया। बाबू लंगड़ जिसपर हत्या के आठ मुकदमे चल रहे है, वह एक झटके में संत हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि सामने जल रही चिता में छंदानंद का शव नही बल्कि देश का संविधान जल रहा है।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

फेसबुक लाइव (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

नरेश कायमगंजी ग्रामसभा स्तर के अखिल भारतीय कवि हैं। ये उस ज़माने से कवि हैं जब कवि सम्मेलन और मुशायरा एक ही मंच पर बिना किसी विवाद के हो जाते थे। शायर सरस्वती वंदना और कवि नात बर्दाश्त कर लेते थे। गंगा-जमुनी तहजीब इस कदर थी कि मुस्लिम श्रोता हिन्दू कवियों को हूट भी नही करते थे। शायर लोग शायरी और ग़ज़ल पढ़ते थे, भाजपा और आर एस एस को डाइस से गाली देने का चलन नही ईजाद हुआ था। हिन्दू कवि भी राम मंदिर बनाने के लिए राज मिस्त्री मंचो पर नही ढूंढते थे।  वे इस बात को मानते थे कि मुस्लिम भी इस देश मे बराबर के नागरिक हैं। उन्हें पाकिस्तान भगाना ठीक नही है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि चारो तरफ बिल्कुल काँग्रेसराज था।

लॉक डाउन के कारण कवि सम्मेलन नही होने से नरेश कायमगंजी बहुत दुःखी थे। कविता की इन कमिंग तो थी किन्तु आउट गोइंग नही हो पा रही थी। लगातार के एकांत में उन्होंने मंथरा पर खंड काव्य रच डाला था। सात सौ छंदों के इस ग्रंथ के लिए एक भी श्रोता उपलब्ध न था। जिसका कोई नही होता उसका फेस बुक होता है, यह सोच कर उन्होंने एक पोस्ट डाली – कल आठ बजे लोक प्रिय कवि नरेश कायमगंजी जी से सुनिए उनका ताज़ा खंडकाव्य “मंथरा का मंथन”। अर्थात कल शाम आठ बजे मैं फेस बुक पर लाइव रहूंगा।

ये बात इतनी जबरदस्त वाइरल हुई कि मोदी जी ने उनका काव्यपाठ फ्लॉप करने के चक्कर मे अपना राष्ट्र के नाम संबोधन भी आठ बजे ही घोषित कर दिया। यह मान कर नरेश जी ने दोपहर को मेरे पास फोन किया। मैं फोन उठाकर हलो का अभी ‘ह’ ही कह पाया था कि नरेश जी उधर से बोल पड़े, “देखा?”

मैंने कहा, “ये वाइस काल है, मैं तो वीडियो कॉल में नही देख पाता।”

वे उधर से झुंझलाकर बोले, “अरे वो मोदी की चाल नही देखी?”

“क्या हुआ मोदी जी की चाल में?” मैन उत्सुकता वश पूछा।

“मेरा फेस बुक लाइव फ्लॉप करने के चक्कर मे आठ बजे अपना प्रोग्राम रख दिया टीवी पर, मेरा खंड काव्य “मंथरा का मंथन” कहीं पॉपुलर न हो जाये, इस डर से।” उन्होंने हमेशा की तरह लम्बी छोड़ी।

मैंने कहा, “आपके खंडकाव्य से मोदी जी को क्या मतलब? आपने कौन सा सोनिया जी पर लिखा है जो वे प्रतिस्पर्धा करेंगे। ये आपका भ्रम है।”

“अरे भैया तुम नही जानते हो, ये बहुत ऊंची चीज़ है। लोग इनकी लफ्फाजी सुनेंगे या मेरा खंडकाव्य। लम्बी-लम्बी छोड़ कर चले जायेंगे, होगा कुछ भी नही। ज़रा बताओ, तुम्हारे खाते में पंद्रह लाख आये? काला धन वापस आया। हर युवा को रोजगार मिला? गंगा की सफाई हुई? नोट बंदी का हिसाब दिया?……………..”

वे आगे और बोलते रहे। मैं उनके लाइव आने और पंद्रह लाख खाते में न आने को आपस मे रिलेट नही कर पा रहा था। मैं बीच मे बोल पड़ा, “इसका आपके खंड काव्य से क्या लेना देना है।”

“कैसे नही लेना देना है तुम नही समझोगे। तुम भक्त हो। तुम्हारी आँखों पर पट्टी बंधी है। तुमसे बात करना बेकार है।” कह कर उन्होंने फोन रख दिया।

अब मैं भी इस असमंजस में था कि मोदीजी का भाषण सुनूं या फेस बुक लाइव पर नरेश कायमगंजी जी का “मंथरा का मंथन”…….
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

चित्र – प्रशान्त पाण्डेय

शेरवानी (हास्य लघुकथा)

नौशाद वाच रिपेयर हाउस एंड आलम ब्रास बैण्ड दरअसल एक ही व्यक्ति के एक ही दुकान में दो अलग-अलग प्रकार के बिजनेस थे। मालिक नौशाद आलम दिन में घड़ियों में समय बजाते थे और रात में शादियों में बाजा। देशी, विदेशी, इलेक्ट्रॉनिक, ऑटोमेटिक, पंजाबी, फिल्मी, भोजपुरी और अश्लील हर प्रकार की घड़ी और गानों में उन्हें महारत हासिल थी, ऐसा उनका अपना आकलन था। लेकिन इस विषय में पब्लिक ओपिनियन कुछ और ही थी। लोगों का कहना था कि नौशाद ने जिसकी एक बार घड़ी बना दी उसका अच्छा समय कभी नहीं आया और जिसकी शादी में बाजा बजा दिया, उसका परमानेन्ट बाजा ही बज गया।

घड़ी के पुर्जे बहुत छोटे होते हैं जिसे बड़ा करके देखने के लिये उनके पास एक उत्तल लेंस था, जिसे बायीं तरफ की भौं और आँख के नीचे के हिस्से में दबाकर वे बिना भेद भाव किये एक आँख से सबकी घड़ी बनाते थे। एक दिन वे किसी विदेशी घड़ी को बनाने में मशगूल थे कि अचानक उन्हें अत्यंत देसी गालियाँ सुनायी पड़ने लगीं। उन गालियों में संज्ञा के तौर पर उनका ही नाम इस्तेमाल किया जा रहा था। इससे पहले कि वे विदेशी घड़ी और देसी गालियों के बीच सामंजस्य बना पाते दो लोग उनकी दुकान के भीतर घुस आए। जिनमें एक व्यक्ति बहुत मोटा और दूसरा बहुत दुबला था। उन्हें देखकर नौशाद सोचने लगे कि अगर दुबला वाला मोटा या मोटा वाला दुबला हो जाये तो ये दोनों शख्श जुड़वा भाई ही माने जाएंगे। शक्ल, अक्ल, वस्त्र और गालियाँ सब हूबहू एक जैसी थीं।

देखते ही देखते दोनों ने एक साथ नौशाद के तमाचा जड़ दिया। लेंस छटक कर दूर जा गिरा और मोटा आदमी भी एकदम से गायब हो गया। ये सब ऐसे हुआ जैसे माया का पर्दा हट जाते ही एको ब्रह्म द्वितीयो न अस्ति हो गया हो। अब नौशाद के सामने एक दुबला पतला आदमी ही बचा था, जो अभी भी क्रोधित था। नौशाद कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि ये आदमी इतना क्रोध क्यों कर रहा है। आस पास के दुकानदार भी शोर सुनकर आ गए।

सबने उस आदमी से क्रोध का कारण जानना चाहा। उसने थैले से शेरवानी निकाल कर दुकान के काउंटर पर पटक दी और बोला, “इसको मैंने शेरवानी सिलने को दी थी। ये देखिए इसने क्या सिलकर भिजवाया है।”

नौशाद समझ नहीं पा रहे थे कि उन्होंने शेरवानी सिलने का काम कब से शुरू कर दिया। तीसरा धंधा अपने आप कैसे चालू हो गया। उन्होंने गाल सहलाते हुए कहा, “मैंने कब सिली! मैं शेरवानी कहाँ सिलता हूँ!”

वह आदमी ज़ोर से चिल्लाया, “हाँ… तो ठीक है जो सिलता है उसको बुलाओ। आज या तो वो नहीं या मैं नहीं।”

नौशाद बोले, “अब मैं कहाँ से लाऊँ? मैंने क्या ठेका लिया है तुम्हारा?”

“जब नहीं करना आता है तो बयाना क्यों लिया? अब क्या मैं ये पहन कर जाऊंगा?” कहते हुए उसने एक पर्चा निकाल कर काउंटर पर पटक दिया।

नौशाद ने पर्चा उठाकर पढ़ा और उस आदमी के मुंह पर पर्चा फेंकते हुए कहा, “अबे क्या मैं अकेला नौशाद हूँ इस शहर में, जा जहाँ नाप दी थी उसको ढूंढ !”

उस आदमी ने दुकान के चारो तरफ देखा और बोला, “आया तो यहीं था।”

“बैण्ड तय करने आये होंगे, जाइये और ओरिजिनल नौशाद टेलर को ढूंढिये, वर्ना शेरवानी की जगह ये गीदड़वानी पहनकर बारात में जाना पड़ेगा।” भीड़ से किसी ने उसे ज्ञान दिया।

उस आदमी के जाने के बाद नौशाद आलम को इस बात का संतोष हुआ कि अच्छा हुआ वे वो वाले नौशाद टेलर नहीं निकले, वर्ना ये आदमी अभी और मारता।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

तेरा तुझको अर्पण (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

गंगादीन खुशी मन से घर की ओर जा रहे थे। सरकार ने जनधन खाते में जो 500 रुपये डाले थे वह आज उसने निकाल लिए थे। सामाजिक संस्थाओं के लोग आटा, दाल, सब्जी आदि एक सेल्फी के बदले में दे जाते थे। पूरे लॉक डाउन में उसे खाली पेट कभी न सोना पड़ा।
आज बहुत दिनों बाद सरकारी ठेका खुला था। उसने चार सौ पंचानबे रुपये की बोतल यह सोचकर ले ली कि सरकार ने मुसीबत के समय उसका साथ दिया था तो उसका भी कर्तव्य है कि इस मुसीबत में सरकार का आर्थिक सहयोग करे। बोतल पायजामे की जेब मे डालकर धीरे-धीरे प्रसन्न मुद्रा में घर की ओर चल दिए। पांच रुपये अभी भी जेब मे थे, उसने सुन रखा था बीड़ी में सरकार टैक्स लेती है अतः यह पैसा भी वह सरकार तक पहुंचाने की फिराक में था।
पीछे से हूटर बजाती एक पुलिस वैन उसके पास आकर रुकी, दो पुर्लिंग पुलिस और एक स्त्रीलिंग पुलिस उतर कर उसके पास आये। पुर्लिंग पुलिस ने गालियों के माध्यम से यह जानना चाहा कि वह लॉक डाउन में कहां से आ रहा है।
चूंकि सरकारी अप्रूवल के बावजूद शराब को समाज में अच्छा नही माना जाता इसलिए गंगादीन के मुंह से अनायास निकल गया, “कहीं नहीं साहब, बस ऐसे ही ज़रा सा गया था।”
इसबार स्त्रीलिंग पुलिस बोली, “ज़रा सा? अबे पूरा तो गए थे। ज़रा सा क्या होता है? झूठ बोलता है?” ….. कहने के साथ उसने वह शब्द भी कहे जो सामान्यतः महिलाएं खुलेआम बोलने में परहेज करती हैं।
इससे पहले गंगादीन कुछ बोल पाते दूसरे पुर्लिंग पुलिस ने अपनी लाठी गंगादीन पर चार्ज कर दी। लाठी पायजामे की जेब मे पड़ी बोतल पर भरपूर पड़ी। बोतल का निर्माण शराब को रखने के लिए किया गया था लाठी खाने के लिए नही, अतः बोतल अपनी काँचीय भाषा मे अपशब्द कहते हुए टूट गयी, और इसी के साथ शराब का  बोतल से अनुबंध समाप्त हो गया। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत अपना काम करने लगा। शराब पायजामा और जेब मे पड़े पाँच रुपये के नोट को तृप्त करती हुई धरती की ओर बढ़ चली। इसीबीच पुलिस की वैन में बैठकर दोनों प्रकार की पुलिस भी जा  चुकी थी। हूटर की आवाज़ प्रति क्षण कम होती जा रही थी।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

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