“देखिये पासवान साहब, आप मेरे पिताजी के समान है, अब पिता के पैसे पर पुत्र का कुछ न कुछ तो अधिकार होता ही है। बीस हज़ार रुपये दीजिये मैं रात दिन एक करके आपकी फ़ाइल ढूंढ निकालूँगा।” कहते हुए गंगा बाबू ने मुंह के भीतर दबे पान का स्थान परिवर्तित करते हुए दायीं दाढ़ से हटाकर उसे बायीं दाढ़ों के बीच शिफ्ट किया।
“बीस हज़ार…” कहते हुए पासवान की आँखें बाहर निकल कर चश्मे के शीशे से टकराईं और पुनः अपने स्थान पर सेट हो गयीं।
गंगा बाबू ने अपनी तर्जनी पर लगे चूने को अपनी जीभ से साफ़ करते हुए कहा, “बीस कहने में आप ‘ई’ की मात्रा इतनी न खींचिए, मंहगाई बहुत है, इसी में चपरासी को भी समझना पडेगा।”
“लेकिन बेटा इतना पैसा हम लाएंगे कहाँ से।” पासवान ने विनत भाव से कहा।
“बैंक से और कहाँ से? अगर आपको और कहीं से मिलता हो तो अलग बात है।” गंगा बाबू ने अजीब सा मुंह बनाते हुए कहा। चूना उनके अनुमान से ज़्यादा था बातों के चक्कर में वे ध्यान नहीं दे पाये, उनकी जीभ का अगला हिस्सा हल्का सा ज़ख़्मी हो गया था।
पासवान ने विवशता प्रदर्शित करते हुए कहा, “बैंक में अब कहाँ बचा, आपको तो मालूम ही है दो साल आठ महीने हो गए रिटायर हुए पेंशन चालू नहीं हुई, फण्ड अटका पड़ा है। यहां रोटी के लाले हैं और आप मज़ाक कर रहे हैं। आप पेंशन चालू कराओ, आगे पीछे समझ लेंगे आपको।”
गंगा बाबू ने मन ही मन पान वाले को गाली दी, आज उसने देशी पान के पत्ते की जगह कोई दूसरा पत्ता दे दिया, स्वाद बढ़ाने के लिए चूना चाटा तो उसने जीभ काट दी, उन्होंने सारा गुस्सा पान पर उतारते हुए उसे बेदर्दी से चबाना शुरू कर दिया। सार-सार की गहते हुए तरल-तरल को मेज के नीचे रखी डस्टबिन में थूकते हुए बोले, “पेंशन और फण्ड तो आपका हक है, वह तो मिलना ही चाहिए और मिलेगा भी, लेकिन गंगा स्नान का पूरा फल तो पण्डे को दक्षिणा देकर ही मिलता है।”
पासवान ने अपनी बात दोहराई, “एक बार पेंशन चालू हो जाए आगे-पीछे आपको समझ लेंगे।”
गंगा बाबू को पान अब भूसा जैसा बेस्वाद लग रहा था, उन्हें अहसास हुआ कि पीक ही पान के प्राण होती है। डस्टबिन में उन्होंने पान के प्राण को थूक कर गलती कर दी। फिर भी बची हुई लुगदी उन्होंने मुंह के अंदर प्रत्येक स्थान पर इस आशा से घुमाई कि शायद किसी रंध्र से आनंद प्राप्त हो और बोले, “आगे पीछे? अरे पासवान साहब मकान बन जाने के बाद कोई भी राज मिस्त्री को चाय पर नहीं बुलाता, काम खत्म पैसा हज़म। आपसे छोटा ज़रूर हूँ पर बच्चा नहीं हूँ। मोटा-मोटा यह समझो कि पेंशन तब चालू होगी जब फ़ाइल मिलेगी, फ़ाइल तब मिलेगी जब आप चाहोगे। ये समझिये कि पेंशन तो अब आपके ही हाँथ में है। हम लोग तो माध्यम मात्र हैं।”
पासवान ने धीरे से कहा, “बीस अधिक हैं, कुछ कम में काम नहीं चलेगा।”
गंगाबाबू को लगा कि मुंह में ज़्यादा घुमाने के चक्कर में सुपारी का एक टुकड़ा दाढ़ में फंस गया है, जीभ का अग्रभाग चूने से ज़ख़्मी था इसलिए उसे माचिस की तीली से ही निकालना पडेगा। उन्होंने उठकर पीछे रखी लोहे की अलमारी से माचिस से एक तीली निकली और पुनः कुर्सी पर बैठते हुए बोले, “पाँच रुपये कम दे देना। अरे चौकीदार, चपरासी सबको समझना पड़ेगा, फ़ाइल ढूंढना खेल समझते हैं आप? मोल-भाव कर रहे हो, सब्जी बेच रहा हूँ क्या मैं।”
बात बिगड़ती देखकर पासवान बोल पड़े, “ठीक है, मैं कल फिर आता हूँ व्यवस्था करके। आप फ़ाइल तो ढुंढ़वाइये।”
इस बीच गंगाबाबू ने दाढ़ में फंसी सुपारी निकाल ली थी, लेकिन अब बचे हुए पान के अवशेष भी उबाऊ लग रहे थे। उन्होंने मुंह के अंदर अजीब सा एंगल बनाते हुए पूरी लुगदी एक जगह एकत्र की और एक गोला बनाकर तेज हवा के झोके के माध्यम से ‘फुक्क’ की आवाज़ के साथ डस्टबिन में उत्सर्जित कर दिया। पानी से कुल्ली करने हुए अजीब गड़गड़ाहट की आवाज में पासवान से बोले, “कल आइये, परसों आइये, तरसों आइये, रोज़ आइये, लेकिन खाली हाँथ मत आइये। मैं फ़ाइल ढुंढ़वाता हूँ, आप निश्चिन्त रहिये, आप मेरे पिता तुल्य हैं, आपका काम होकर रहेगा।”
पासवान उठकर जाने लगे। पीछे से गंगाबाबू बोले, “कल चौरसिया का ही पान लाना, उसका ठीक रहता है। पाड़े को पान बनाने की तमीज नहीं है। आज जीभ कट गयी।”
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बहुत भारी मन से पासवान घर पहुंचे थे, स्वास्थ्य भी अब साथ नहीं दे रहा था। पत्नी ने पानी के साथ-साथ बैंक से आये एक पत्र को थमाते हुए बिना उत्तर के लालच में एक प्रश्न किया, “कुछ बात बनी?”
पासवान ने एक ही सांस में पानी का गिलास और पत्र दोनों निपटा दिए। पत्र में जो लिखा था उसके अनुसार मकान पर बैंक कब्जा करने की सूचना दे रही थी। बैंक ने अंग्रेजी में बड़ी सभ्यता से उन्हें निहायत ही बेईमान और मक्कार व्यक्ति लिखा था। साथ ही फ़ौरन उपस्थित होकर अपना मत स्पष्ट करने का धमकीनुमा आग्रह भी किया था। उन्होंने घड़ी पर नज़र डाली, चार से कुछ कम बजा था, अगर फ़ौरन चल दें तो बैंक खुला मिल सकता था। वे तुरंत निकल पड़े। पीछे से पत्नी ने पत्नी की ही तरह प्यार प्रदर्शित करते हुए कहा, “अरे खाना तो खा कर जाओ। आये और चल दिए, घर न हो गया सराय हो गयी दिन भर पागलों की तरह…….”
बैंक खुला देखकर पासवान ने राहत की सांस ली। फ़ौरन बैंक मेनेजर से मिलकर एक माह का मौक़ा लेना था। जैसे ही वे मैनेजर के कमरे की और बढे उनके चपरासी ने मुंह के बजाय भौहों के माध्यम से पूछा, “किससे मिलना है।”
पासवान ने मुंह से ज़वाब दिया, “मैनेजर साहब से।”
चपरासी बोला, “बस निकल ही रहे हैं फौरन मिल लो। वैसे क्या काम है?”
पासवान ने जवाब देने के बजाय अंदर झाँककर पूछा, “अंदर आ जाऊं श्रीमान जी।”
मैनेजर टेलीफोन पर किसी से बात कर रहे थे लिहाजा हाँथ के इशारे से कुर्सी की और बैठने का संकेत किया और वार्ता में मशगूल हो गये, “पुलिस कुछ नहीं करेगी, साथ में अपने आदमी भी रखना, फेंक दो साले का सामान घर से बाहर। मुझे मकान खाली चाहिए बस।”
टेलीफोन में उधर से जो कहा जा रहा था वह उन्हें नहीं सुनाई दिया। मैनेजर गुस्से में चिल्लाया, “बुजुर्ग है तो हम क्या करें, पेंशन नहीं चालू हुई तो हमारा क्या दोष। आप लोगो को कमीशन किस बात का देते हैं, कि आप हमे प्रवचन दें, न कर पाओ तो बताओ। पप्पू ढक्कन से बात करें। साले पुराने मैनेजर ने भिखारियों को होम लोन बाँट दिया, वसूली हमें करनी पड़ रही है। ऊपर से रोज दबाव पड़ रहा है, धर्म खाता नहीं खोल कर बैठी है बैंक समझे। कुछ भी करो, चार दिन में हमें मकान पर कब्जा चाहिए बस….”
पासवान समझ गए कि उन्ही के मकान खाली कराने की बात चल रही है। मैनेजर कुछ सख्त जान पड़ रहा था। बात कैसे की जायेगी, ये मानेगा भी या नहीं, जीवन भर किराए के एक कमरे रहे। जिसके बाएं कोने में किचन, दायें कोने में स्टोर, सामने जमीन पर छह बाई साढ़े तीन की दरी का बेड रूम, उससे सटी शेष जगह में दोनों बच्चों का स्टडी रूम कम डाइनिंग रूम जोकि रात्रि ग्यारह बजे के बाद बच्चों का बैडरूम भी हो जाता था, सारा कुछ आँखों के सामने से घूम गया। पेट काटकर जो पैसे जोड़े थे उससे जमीन ली और फण्ड के पैसे की आशा में लोन लेकर मकान बनवाया, फण्ड आया नहीं मकान जाने वाला है। वे अंदर-अंदर बहुत घबरा गए।
मैनेजर फोन रखकर पासवान से मुखातिब हुआ, “हाँ… तो बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”
पासवान उसके गुस्से को फोन की वार्ता से समझ चुके थे, हड़बड़ा कर बोले, “जी वो खाता खुलवाना था आपकी बैंक में।”
बैंक मैनेजर एकदम से भड़क कर खड़ा हो गया, “तो… बाहर फार्म लेकर जमा कर देना था, यहां कहाँ घुसे चले आये। दिमाग खराब है आपका। हर काम मैनेजर ही करता है क्या?” कहते हुए उन्होंने चपरासी को आवाज़ दी, “राम लोचन……”
चपरासी फ़ौरन हाज़िर हुआ, मैनेजर ने पासवान की तरफ इशारा करते हुए व्यक्ति की जगह वस्तु वाचक संज्ञा में कहा, “ये क्या है?”
चपरासी ने कन्धों को ऊपर उचकाया और दोनों हथेलियों को इस तरह घुमाया जिसका अर्थ था मुझे क्या मालूम।
मैंनेजर को देखकर ऐसा लगा कि जैसे किसी ने पहले से भड़के हुए सांड को लाल कपडा दिखा दिया हो, बोला, “अबे कभी-कभी मुंह से भी बोला कर।”
चपरासी अजीब सी आवाज़ में मुंह ऊपर की ओर करके बोला, “पान मसाला खाये है अभी-अभी, आप पान मसाले पर प्रवचन देने लगेंगे इसलिए नहीं बोला।”
मैनेजर ने गुस्से में कहा, “खाता खुलाने के लिए मेरे पास आये हैं, अब मैं बैठकर इनका खाता खोलूँ? जिसको देखो अंदर घुसता चला आता है। तुम क्या कर रहे हो बाहर?”
चपरासी ने सफाई दी, “मैंने पूछा था इनसे, पर इन्होंने बताया ही नहीं। मैं समझा कि कोई बड़ा काम होगा। अब मुझे क्या मालूम था कि ये सौ वाट का बल्ब जलाने के लिए भाखड़ा नांगल बाँध में कटिया फॅसा देंगे।”
पासवान तब तक उठ कर बाहर आ गए चपरासी ने पीछे से आकर उन्हें एक कागज़ थमाया और बोला, “कल साढ़े दस बजे इसे पूरा कम्पलीट करके सात नम्बर काउंटर पर जमा कर देना।
पासवान ने कागज़ लिया और भारी मन से घर की ओर चल दिए।
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बीस हज़ार रुपये लेकर गंगा बाबू ने अपना काम पूरी ईमानदारी से कर दिया था। वह फ़ाइल जो विगत दो वर्ष आठ महीने से खोई हुई थी अचानक उन्ही की अलमारी में बरामद हो गयी।
“बहुत मेहनत करनी पड़ी इसे ढूँढने में”, गंगा बाबू ने मेज पर फ़ाइल पटकते हुए कहा। फ़ाइल पटकने के ढंग से दो अर्थ एक साथ निकल रहे थे पहला मुश्किल से मिलाने का रोष और दूसरा उसपर जमी धूल की सफाई।
पासवान फ़ाइल के दर्शन मात्र से स्वयं को धन्य महसूस कर रहे थे। आज उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ कि अब पेंशन मिल जायेगी। बोले, “बहुत दौड़ना पड़ा ये दिन देखने के लिए।”
गंगा बाबू ने पुराने पान का मलवा डस्ट बिन में उड़ेला और नए पान को मुंह के हवाले करते हुए कहा, “पेंशन दफ्तर वह तीर्थ स्थान है जहां हर सरकारी कर्मचारी को बार-बार आना पड़ता है। ये कोई गंगा सागर तो है नहीं कि सब तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार। आपका काम तो फिर भी जल्दी हो गया, लोग दस-दस साल से चक्कर लगा रहे है। कई लोगों को तो यहां की फाइल नहीं मिली उधर यमराज की फाइल खुल गयी। पेंशन खाते में जमा नहीं हुई यमराज ने उन्हें ही जमा कर लिया। आप वास्तव में भाग्यशाली है। पेंशन में देर तो लगती ही है। सरकार को भी पता है कि पेंशन प्रारम्भ कराने के लिए बहुत चक्कर लगाने पड़ते हैं, इसके लिए खाली आदमी चाहिए, इसलिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन का प्राविधान रखा। ताकि पेंशनर ठीक से अपनी पैरवी कर ले।”
पासवान की फ़ाइल अभी भी गंगा बाबू के कब्जे में थी अतः उन्हें उनकी बात से सहमत ही होना पड़ा, “ठीक कह रहे हो आप। अब पेंशन कब से शुरू हो जायेगी और फण्ड का चेक कब मिलेगा।”
गंगा बाबू पान का पहला पीक थूकना नहीं चाह रहे थे उन्हें मालूम था कि किमाम की सारी खुशबू पहले पीक के साथ ही निकल जाती है, पान में फिर वह मज़ा नहीं रहता लेकिन उनसे बीस हज़ार रुपये अभी-अभी लिए थे इसलिए नैतिकता के आधार पर जवाब तो देना ही था। पीक और शब्दों में सामंजस्य बैठाने के लिए उन्होंने अपना मुंह ऊपर की ओर कर के संक्षिप्त सा उत्तर दिया, “बहुत जल्द।”
पासवान ने उत्सुकता वश पुछा, “फिर भी कब तक?”
गंगा बाबू को लगा कि इस बात के जवाब में लंबा बोलना पड़ेगा अतः उन्होंने भारी मन से डस्ट बिन में थूकने के बाद कहा, “अब इस बात का गारंटीड जवाब मेरे पास नहीं है, ये समझिये कि फण्ड का चेक आपके घर रजिस्टर्ड डाक से पहुंचेगा और पेंशन सीधे आपके अकाउंट में। आप आराम से अपने घर में बैठकर इंतज़ार करिये। अब हम और आप कुछ नहीं कर सकते जो भी करेंगे वो ईश्वर प्रसाद यादव करेंगे।” कहते हुए उन्होंने सामने बैठे बड़े बाबू ईश्वर प्रसाद यादव की ओर इशारा किया।
पासवान को लगा कि वो आसमान से गिरे और खजूर पर न गिर कर कटीली झाड़ी में गिर गए हैं। ईश्वर प्रसाद यादव उन्हें शक्ल से गंगा बाबू से अधिक धूर्त जान पड़ रहा था। वे बड़े बाबू की ओर जाने लगे, पीछे से गंगा बाबू अपने कुर्ते पर गिरे पान को साफ़ करते हुए बोले, “अरे अपनी फ़ाइल भी ले जाओ उन्ही को दे देना। फ़टाफ़ट सब काम हो जाएगा।”
ईश्वर प्रसाद ने फ़ाइल देखकर हिसाब लगाया और बोले, “सत्रह लाख के करीब फण्ड और पंद्रह हजार के आसपास प्रतिमाह पेंशन बनेगी, भाई बधाई हो। गंगा को कितना दिया?”
पासवान ने बात को छिपाने के प्रयास में कहा, “अरे वह तो घर का बच्चा है उसे क्या देना।”
ईश्वर प्रसाद बोले, “झूठ मत बोलिये, साला अपने सगे और इकलौते बाप की फ़ाइल बढ़ाने में बारह हज़ार मेरे माध्यम से वसूला था आपको क्या ख़ाक छोड़ेगा। खैर जो भी हो मुझे क्या। पचास हज़ार लगेंगे तीसरे दिन भविष्य निधि का चेक आपके घर पहुँच जाएगा।”
पासवान को लगा कि या तो उनके कान के सिग्नल कमज़ोर है, अथवा ईश्वर प्रसाद यादव का मुंह ठीक से काम नहीं कर रहा है। इतने से काम के लिए पचास हज़ार नहीं हो सकता। उन्होंने अपने कान को उनके मुँह की सीध में करते हुए पूछा, “कितना?”
“पचास हज़ार…” ईश्वर प्रसाद ने काफी तेज़ और डंके की चोट पर वाली स्टाइल में कहा।
पासवान को सुनकर चक्कर आ गया, बिना पूछे वे सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गए। इतने रुपये की व्यवस्था करना उनके सामर्थ्य में नहीं था। उन्हें लगा कि उनके हाँथ में पेंशन वाली रेखा नहीं है। जीवन रेखा ने पेंशन रेखा को काट दिया है।
बाहर आकर उन्होंने सरकारी नल से पानी पिया और अपने घर के बजाय लक्ष्मी कान्त के घर की ओर चल दिए।
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रिटायरमेंट के बाद पहली बार पासवान इतनी देर से घर आये थे। चेहरा उतरा, कंधे झुके, बाल बिखरे हुए और थकावट चेहरे से टपक रही थी। पासवान की पत्नी दयावती ने उन्हें देखकर अंदाज़ा लगाया कि किसी ने उन्हें पचास जूते मारे है। पासवान सोफे पर इस आशय से बैठे ताकि ज़रुरत पड़ने पर लेट भी सकें। पत्नी सामने कुर्सी पर बैठ कर उनसे आज के अपडेट्स लेने लगी।
गले में कुछ फंसा न होने के बावजूद पासवान गला साफ़ करने की स्टाइल में बोले, “आज बड़े बाबू पचास हज़ार मांग रहे थे।”
दयावती की आवाज सामान्य महिलाओं की आवाज से कुछ ज़्यादा कर्कश थी, जब वे बोलती थीं तो ऐसा लगता था कि महिलाओं का एक समूह एक साथ बोल रहा हो। अपनी शक्ल, स्वभाव और स्वर का जो तालमेल उन्होंने बैठाया था वह पुरस्कार योग्य था, पासवान जब सेवानिवृत्त नहीं हुए थे तब वे अधिकतर कार्यालय में ही रहते थे। इससे पत्नी के प्रकोप से उनका सामना कम होता था। किन्तु अब उनके पास कोई विकल्प भी नहीं था।
स्वभाव के अनुरूप दयावती बोलीं, “अरे, आप तो आज बीस हज़ार लेकर गए थे। वो किसे पकड़ा आये।”
पासवान ने समझाने का प्रयास करते हुए कहा, ” वो तो गंगा बाबू की फीस थी। वो छोटे बाबू हैं।”
दयावती वाकयदे भड़कते हुए बोलीं, “इसके बाद मंझले बाबू अपनी फीस मांगेगे, तुम्हे सब बेवकूफ समझते हैं। खुद कभी चवन्नी नहीं ली और अब बाँट रहे हो प्रसाद। हद है।”
पासवान को सांस लेने में आज कुछ ज़्यादा ही जोर लगाना पड़ रहा था, आज से पहले वे कभी भी नहीं जान सके कि वे कब सांस खीच रहे है और कब छोड़ रहे है लेकिन आज उन्हें सांस खीचना भी एक काम की तरह लग रहा था।
तब तक दयावती ने दूसरा विस्फोट किया, “आज बैंक ने कुछ गुंडे भेजे थे। दरवाजे पर गाली गलौज करके गए हैं। कह रहे थे कल सुबह तक मकान खाली चाहिए वरना सारा सामान सड़क पर फेंक देंगे।”
पासवान ने सोफे पर लेटते हुए कहा, “कल तो फण्ड का चेक मिल जाएगा, जिसे दिखाकर बैंक को समझाया जा सकता है। तुम चिंता न करो।”
दयावती ने आशंका व्यक्त की, ” लेकिन पचास हज़ार आएंगे कहाँ से।”
पासवान ने कहा, “उसकी चिंता तुम न करो। व्यवस्था हो गयी है। आज रात तक बड़ेबाबू के घर पैसा पहुँच जाएगा।”
“लेकिन कैसे? चिराग घिसकर जिन्न निकालोगे क्या? तुम्हारा नाम अलादीन पासवान नहीं देवीदीन पासवान है। ये याद रखो।” इस बार दयावती के स्वर में करुणा भी थी।
“तुम पानी लाओ बस”, कहकर उन्होंने अपनी आँखे बंद कर लीं। पूरे दिन की घटनाएं एक साथ उनके दिमाग पर हथौड़े मारने लगीं। पेंशन ऑफिस से सीधे वे लक्ष्मीकांत के घर गए थे। वहां हुई वार्ता और पैसे के इंतजाम की प्रक्रिया पत्नी को बताकर उसे एक नया कष्ट देना नहीं चाह रहे थे। आज के दिन का उत्तरार्ध उनके जीवन का संभावतः सबसे भयानक समय था। पचास हज़ार के इंतजाम ले लिए लक्ष्मीकांत ने उन्हें अपनी किडनी बेचने की राय दी थी और इसके लिए एक डॉक्टर से भी मिलवाया था। सारे दृश्य किसी चलचित्र की तरह आँख बंद करते ही बार-बार सामने प्रकट हो जा रहे थे। हर दृश्य के बाद एक काले कपडे में राक्षसी अट्टहास करती हुई आती और उनकी तरफ हाँथ से कारुणिक इशारा करके गायब हो जाती।
डॉक्टर कह रहा था, “किडनी तो निकाल लेंगे, लेकिन इनकी उम्र ज़्यादा है। अब ये भारी काम बिल्कुल नहीं कर पाएंगे। अगर राजी हों तो तीन दिन बाद ऑपरेशन कर दूं।” फिर राक्षसी हंसती हुई आयी और गायब हो गयी।
लक्ष्मी कान्त कह रहे थे, “पैसा आज शाम को ईश्वर प्रसाद यादव के घर पहुँच जाएगा आप चिंता न करें।” राक्षसी फिर हँसते हुए आयी और गायब हो गयी।
लक्ष्मी कान्त अपने फोन से बड़े बाबू ईश्वर प्रसाद यादव से बात कर रहे थे कुछ देर बाद उन्होंने पासवान को फोन दे दिया, दूसरी तरफ से ईश्वर प्रसाद बोल रहे थे, “पासवान साहब आप चिंता न करें कल सुबह आपके घर चाय पीने आ रहा हूँ, लगे हाथों भविष्य निधि का चेक भी दे दूंगा।” इसबार राक्षसी नहीं पत्नी ने झकझोर कर उठाया, “ये लो पानी, अरे तुम्हारा चेहरा इतना पीला क्यों है क्या हुआ?”
पासवान को अहसास हुआ कि यदि वे बोलेंगे तो बहुत ताकत खर्च होगी, उन्होंने हाँथ के इशारे से उन्हें जाने को कहा। एक गिलास पानी उन्हें समुद्र से कम नहीं लग रहा था किसी तरह सामने रखी सेंटर टेबल पर बिना पानी पिए उसे पटका और आँख बंद करके लेट गए। इसबार उन्हें लगा कि राक्षसियों का झुण्ड रुदन करता हुआ उनके पास आ रहा था।
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सुबह जब ईश्वर प्रसाद यादव भविष्य निधि का चेक लेकर पासवान के घर पहुँचे उस समय तक पासवान उसी सोफे पर लेटे स्वयं को असहाय सा महसूस कर रहे थे।
“ये लीजिये अपना सत्रह लाख का चेक और हाँ मैंने उस किडनी तस्कर लक्ष्मीकांत को बिना पैसे लिए भगा दिया था कल शाम। आपको बताना चाहिए था कि पैसे नहीं है मैं दूसरा रास्ता निकालता। सरकारी कर्मचारी के पास पचास रास्ते हमेशा रहते हैं। किडनी बेचकर भविष्य निधि लेना कहाँ उचित है। चेक बैक में जमा कीजिये और पैसा मिलते ही डॉट डॉट डॉट।”
पासवान को लगा कि उन्हें किसी ने संजीवनी बूटी का आसव पिला दिया हो। एक दम से उठकर बैठ गए। सारा नैराश्य भाव एक क्षण में लुप्त हो गया। उन्हें आज फिर अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ। ईश्वर प्रसाद यादव में उन्हें भगवान् श्री कृष्ण की छवि दिखने लगी। उन्होंने फिर आँखे बंद करके राक्षसियों को चेक करना चाहा किन्तु इसबार उन्हें मुस्कराती हुई अप्सराएं दिखाई देने लगीं।
पत्नी को आवाज देते हुए चिल्लाये, “अरे देखो अपना ईश्वर आया है, कुछ चाय वाय लाओ भाई। ये एक गिलास पानी से क्या होगा और ले आओ। बहुत प्यासा हूँ।”
दयावती ने पासवान को इतना खुश कभी नहीं देखा था, आज खुश देखकर बहुत आनंद का अनुभव कर रही थी। हालांकि इस बीच पासवान ने फण्ड का चेक उन्हें थमा दिया था लेकिन उन्हें पासवान के चेहरे की मुस्कान आज अधिक मूल्यवान लग रही थी। पासवान ने देखा कि दयावती ने अभी तक चेक की धनराशि भी नहीं देखी है। वह तो अपलक पासवान के चेहरे को निहार रही है अर्थात उसकी असल परेशानी पासवान का परेशान रहना था न कि अभावों से संघर्ष। दोनों लोग एक दूसरे को खुश देखकर गदगद हो रहे थे।
ईश्वर प्रसाद यादव बोल पड़े, ” ये लैला-मजनू, लैला-मजनू बाद में खेल लेना। पहले मुझे चाय तो पिलाओ।”
दयावती इस तरह शर्मा कर अंदर भागी जैसे पहली बार मैके आये पति से छिपकर बात करते हुए पिता जी ने देख लिया हो।
चाय का कप रखते ही ईश्वर यादव बोले, “बहुत बहुत धन्यवाद अब मैं दफ्तर जा रहा हूँ रास्ते में ज़रा बैंक के मैनेजर से भी मिलना है। जगदीश मेरे साथ ही पढता था, अब यहीं ट्रान्सफर होकर आया है। अरे हाँ… आपको भी तो चेक जमा करनी है चलिए एक से भले दो आपका भी परिचय करा देंगे।”
पासवान को लगा कि दुखान्त हो रही कथा तो घनघोर सुखान्त की कगार पर है। इसमें धन्यवाद ईश्वर प्रसाद यादव को दें या ईश्वर को।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।
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