आला (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

कन्नौजिया मास्टर सोफे पर कुछ इस तरह से विद्यमान थे कि उन्हें देखकर ठीक-ठीक अनुमान लगाना कठिन था कि वे बैठे हैं, या लेटे हैं। बैठने और लेटने के बीच की एक नयी किस्म की वैराइटी उन्होंने ईजाद की थी। जिस अवस्था मे वे इस समय अवस्थित थे, उस स्थिति में सोया भी जा सकता था, और खाया भी। उनके बैठने के तरीके से ऐसा जान पड़ रहा था कि वे जानबूझ कर शरीर का भार उन अंगों पर डाल रहे हैं, जिनका प्रयोग प्रायः बैठने के लिए नही किया जाता है। जिन अंगों के सहारे बैठने का चलन सदियों से प्रचलित है वे उसके प्रयोग से परहेज करते से प्रतीत हो रहे थे। चेहरे का निर्विकार भाव देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें संसार की नश्वरता का भान हो चुका है। पलकों के अलावा शरीर का कोई भी वाह्य अंग इस समय एक्टिवेट नही दिख रहा था। अगर कम्प्यूटर की भाषा मे कहा जाए तो उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वे हैंग हो गए हैं।

ऐसा पहली बार हुआ था, इसलिए घर के लोग अभी अभ्यस्त नही हुए थे, सभी चिंतित थे। इस नए प्रकार के रोग का कोई स्पेशलिस्ट डॉक्टर भी गांव में न था। एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र था, जिसमे ले दे कर एक ही डॉक्टर था, जिनसे गांव के लोग दे ले कर इलाज कराते थे। डॉ. तेग बहादुर कालरा, जिन्हें तिरस्कार से सब टी.बी. कालरा कहते थे, गांव को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी सरकार ने उन्ही को कंधे पर डाल रखी थी। सरकारी दवा देने के मामले में वे किसी भी प्रकार का भेदभाव नही करते थे। कोई भी रोग हो वे दवा एक ही प्रकार की देते थे। मरीज के ठीक होने की ज़िम्मेदारी सरकार और दवाओं की रहती थी। गाँव के लोग उन्हें आला दर्जे का डॉक्टर मानते थे, क्योंकि पूरे गाँव मे एक मात्र वे ही थे, जिनके पास आला था।

कन्नौजिया मास्टर अस्पताल जाने की स्थिति में नही थे। उनका वजन भी डॉक्टर टी.बी. कालरा से अधिक था, अतः तमाम विचार विमर्श के बाद घर के लोगों ने यह निर्णय लिया कि डॉक्टर साहब को घर लाना अधिक आसान है, और उन्हें ले आये। डॉक्टर साहब ने पहले कन्नौजिया मास्टर के शरीर का हवाई सर्वेक्षण किया, फिर कुछ देर के लिए उनकी नब्ज पकड़ी। उन्हें सब कुछ सामान्य सा लगा। अचानक उन्हें आभास हुआ कि जो उपकरण उनके गले मे लटक रहा है, दरअसल वह टाई नही, आला है, अतः एक बार इसका भी प्रयोग कर लेना उचित रहेगा। उस समय गांव मे पैथालॉजी के नाम पर आला ही एक ऐसा उपकरण था जो शरीर की सारी जांचें कर लेता था। कन्नौजिया मास्टर के विभिन्न अंगों पर थोड़ी-थोड़ी देर आला रख कर डॉक्टर कालरा ने कुछ सुनने का प्रयास किया। उन्हें अहसास होने लगा कि सारी डॉक्टरी की पढ़ाई व्यर्थ चली गयी। देखने मे अच्छा खासा बीमार आदमी चेक करने पर अच्छा खासा लग रहा है, बीमार नही। सारे लक्षण एक महास्वस्थ व्यक्ति के है।

“कहो भाई उतरी या नही?” कहते हुए देवी दीन दुबे अंदर दाखिल हुए।

“क्या??????” लगभग सभी एक साथ कोरसनुमा बोले।

“भांग और क्या? अरे बहुत तगड़ी पिये है।” कहते हुए दुबे जी बैठ गए।

एक दम से डॉक्टर टी.बी. कालरा चिल्लाए, “तो उतनी देर से मेरा समय क्यों खराब कर रहे हो। पहले बताना चाहिए था।”

“पहले? अरे पहले कैसे बताते? जब पियेंगे तभी तो बताएंगे। आप भी डॉक्टर साहब अंधेर किये हो। आपके पास तो ये मशीन है, ये नही बताई? सब फर्जी ही भौकाल है क्या?” दुबे जी ने डॉक्टर कालरा के गले मे लटके आले पर कटाक्ष किया।

डॉक्टर साहब ने बहस करने की बजाय वहां से निकलना बेहतर समझा, और चले गए।

“तो क्या अब ये ऐसे ही रहेंगे हमेशा? या थोड़ा बहुत ठीक भी होंगे?” इसबार कन्नौजिया मास्टर का लड़का छुट्टन बोला।

“ठीक हो जाएंगे, ऐसा करो इनके कानों में सरसों का तेल डालो।”

दुबे जी का बताया उपचार काम आया। पहली बार कन्नौजिया मास्टर बोले, “अबे चौदह पंचे सत्तर होता है।”

दुबे जी किसी कुशल उपचारक की भांति बोले, “स्मृतियां वापस आएंगी, थोड़ा समय लगेगा। अभी ये स्कूल में पढ़ा रहे है, कान में तेल डालते रहो घर भी आ जाएंगे। मैं जा रहा हूँ, कोई दिक्कत हो तो बताना। ये डॉक्टर, फाक्टर, कालरा, हैजा के चक्कर मे मत पड़ना।”

दुबे जी के जाने के बाद छुट्टन ने उनके कानों में फिर तेल डाला। कन्नौजिया मास्टर फिर बोले, “उन्नीस दूना अड़तीस, उन्नीस तियाँ सत्तावन, उन्नीस चौके…”

कन्नौजिया मास्टर को घर तक लाने में छुट्टन का डेढ़ लीटर सरसों का तेल लगा।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

Published by Rajendra Pandit

हास्य-व्यंग्य कवि एवं कहानीकार

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