फेसबुक लाइव (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

नरेश कायमगंजी ग्रामसभा स्तर के अखिल भारतीय कवि हैं। ये उस ज़माने से कवि हैं जब कवि सम्मेलन और मुशायरा एक ही मंच पर बिना किसी विवाद के हो जाते थे। शायर सरस्वती वंदना और कवि नात बर्दाश्त कर लेते थे। गंगा-जमुनी तहजीब इस कदर थी कि मुस्लिम श्रोता हिन्दू कवियों को हूट भी नही करते थे। शायर लोग शायरी और ग़ज़ल पढ़ते थे, भाजपा और आर एस एस को डाइस से गाली देने का चलन नही ईजाद हुआ था। हिन्दू कवि भी राम मंदिर बनाने के लिए राज मिस्त्री मंचो पर नही ढूंढते थे।  वे इस बात को मानते थे कि मुस्लिम भी इस देश मे बराबर के नागरिक हैं। उन्हें पाकिस्तान भगाना ठीक नही है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि चारो तरफ बिल्कुल काँग्रेसराज था।

लॉक डाउन के कारण कवि सम्मेलन नही होने से नरेश कायमगंजी बहुत दुःखी थे। कविता की इन कमिंग तो थी किन्तु आउट गोइंग नही हो पा रही थी। लगातार के एकांत में उन्होंने मंथरा पर खंड काव्य रच डाला था। सात सौ छंदों के इस ग्रंथ के लिए एक भी श्रोता उपलब्ध न था। जिसका कोई नही होता उसका फेस बुक होता है, यह सोच कर उन्होंने एक पोस्ट डाली – कल आठ बजे लोक प्रिय कवि नरेश कायमगंजी जी से सुनिए उनका ताज़ा खंडकाव्य “मंथरा का मंथन”। अर्थात कल शाम आठ बजे मैं फेस बुक पर लाइव रहूंगा।

ये बात इतनी जबरदस्त वाइरल हुई कि मोदी जी ने उनका काव्यपाठ फ्लॉप करने के चक्कर मे अपना राष्ट्र के नाम संबोधन भी आठ बजे ही घोषित कर दिया। यह मान कर नरेश जी ने दोपहर को मेरे पास फोन किया। मैं फोन उठाकर हलो का अभी ‘ह’ ही कह पाया था कि नरेश जी उधर से बोल पड़े, “देखा?”

मैंने कहा, “ये वाइस काल है, मैं तो वीडियो कॉल में नही देख पाता।”

वे उधर से झुंझलाकर बोले, “अरे वो मोदी की चाल नही देखी?”

“क्या हुआ मोदी जी की चाल में?” मैन उत्सुकता वश पूछा।

“मेरा फेस बुक लाइव फ्लॉप करने के चक्कर मे आठ बजे अपना प्रोग्राम रख दिया टीवी पर, मेरा खंड काव्य “मंथरा का मंथन” कहीं पॉपुलर न हो जाये, इस डर से।” उन्होंने हमेशा की तरह लम्बी छोड़ी।

मैंने कहा, “आपके खंडकाव्य से मोदी जी को क्या मतलब? आपने कौन सा सोनिया जी पर लिखा है जो वे प्रतिस्पर्धा करेंगे। ये आपका भ्रम है।”

“अरे भैया तुम नही जानते हो, ये बहुत ऊंची चीज़ है। लोग इनकी लफ्फाजी सुनेंगे या मेरा खंडकाव्य। लम्बी-लम्बी छोड़ कर चले जायेंगे, होगा कुछ भी नही। ज़रा बताओ, तुम्हारे खाते में पंद्रह लाख आये? काला धन वापस आया। हर युवा को रोजगार मिला? गंगा की सफाई हुई? नोट बंदी का हिसाब दिया?……………..”

वे आगे और बोलते रहे। मैं उनके लाइव आने और पंद्रह लाख खाते में न आने को आपस मे रिलेट नही कर पा रहा था। मैं बीच मे बोल पड़ा, “इसका आपके खंड काव्य से क्या लेना देना है।”

“कैसे नही लेना देना है तुम नही समझोगे। तुम भक्त हो। तुम्हारी आँखों पर पट्टी बंधी है। तुमसे बात करना बेकार है।” कह कर उन्होंने फोन रख दिया।

अब मैं भी इस असमंजस में था कि मोदीजी का भाषण सुनूं या फेस बुक लाइव पर नरेश कायमगंजी जी का “मंथरा का मंथन”…….
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

चित्र – प्रशान्त पाण्डेय

Published by Rajendra Pandit

हास्य-व्यंग्य कवि एवं कहानीकार

12 thoughts on “फेसबुक लाइव (हास्य-व्यंग्य लघुकथा)

  1. नरेश जी का लाइव सुनाई लो भाई, कायमगंज के संयोजक हैं

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  2. नरेश जी का लाइव सुन लो भाई, कायमगंज के संयोजक हैं

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  3. सन्तोष सिंह 'लाॅकडाउन में कबीर वाले''s avatar सन्तोष सिंह 'लाॅकडाउन में कबीर वाले' says:

    कुछ हो न हो पर कायमगंजी अपनी आदत पर कायम हैं , ये क्या कम है । लोग तो बात-बात पर बात कहे कर मुकर जाते हैं ।
    दादा इधर मै भी गद्य लिखने का प्रयास कर रहा हूँ । आप से विनती है कि देख कर मेरा भी मार्गदर्शन कीजिए । अक्सर लोग वाल पर वाह वाह लिख कर चले जाते हैं । कमियाँ कोई नहीं बताता है ।

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  4. जो विषय उठाते हैं, उसी में कमाल करते हैं। बहुत खूब ।जय हो जय हो जय हो

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  5. एक दूसरे को झेल लेते थे, हिन्दू कवि को हूट नहीं करते थे… के साथ आपका छक्के पर छक्का ग़ज़ब ढा रहा था।
    एक दम कांग्रेस राज था… यह धोनी वाला हेलीकॉप्टर शॉट निकला। और आपने मैच ही जीत लिया।

    हैलो का ह बोलते ही उनका देखा कहना, और आपका हकबकाना…गजब मासूमियत के साथ मजा ही मजा दे गया।

    आप सा कोई नहीं है सर…
    मैं अब इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका हूं।

    गजब…गजब…. और गजब…..
    बहुत बड़ी सी बधाई “द पंडित जी”
    🌹❤️

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    1. राजेश जी आप पढ़ लेते हो लगता है सफल हो गया लिखना। आपके कमेंट से मुझे अपने लेखन का मानदेय मिल जाता है। बहुत आभार आपका भैया।

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  6. जबरदस्त व्यंग्य.. ग्राम सभा स्तर के अखिल भारतीय कवि से जो व्यंग्य प्रारंभ हुआ वह पंक्ति दर पंक्ति मिलता रहा..व्यंग्य लेखन में आपका कोई सानी नही है पंडित जी..बहुत बहुत बधाई

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