कानपुर के जगन्नाथ की रामलीला पार्टी बहुत मशहूर थी उन दिनों। बहुत बढ़िया रामलीला खेलते थे। जगन्नाथ पार्टी मालिक थे इसलिये पैसा बचाने के लिए उन्हें खुद बहुत से रोल करने पड़ते थे। जनक, भरत, केवट और सुलोचना का चरित्र ऐसा उतार देते थे कि स्वर्ग से असली वाले किरदार भी सोचने पर विवश हो जाते कि ऐसा तो हम भी न कर पाए। मेरे गांव में उस वर्ष उन्ही की पार्टी रामलीला खेलने आई थी।

गया प्रसाद और प्रयागी आपस मे एक दूसरे के सगे भाई थे। रामलीला मैदान से उनका मकान इतना सटा हुआ था कि पिछले साल लंका समझकर हनुमान जी ने उन्ही के छप्पर में पूछ छुआ दी थी। तब गया और प्रयागी का आपस मे इतना विवाद नही था इसलिए दोनों भाइयों ने आग बुझाने के बजाय रामलीला पार्टी पर चढ़ाई कर दी और एक-एक पैसा वसूल लिया।
इस वर्ष दोनों भाइयों में इस कदर झगड़ा था कि उसके गम में प्रयागी शराब पीने लगा था। शराब पीकर वह गया प्रसाद को इस प्रकार की गालियां देता था जो न चाहते हुए भी समान रूप से उस पर भी लागू होती थी। कभी-कभी वाकयुद्ध मल्लयुद्ध से होता हुआ मलयुद्ध तक पहुंच जाता। गया प्रसाद को भी उसके लेवल में आने के लिए शराब की शरण मे जाना पड़ता, कुल मिलाकर शराब ही एक ऐसा माध्यम थी जो दोनों भाइयों को आपस मे जोड़े थी। कभी-कभी शराब उन्हें इतना जोड़ देती, कि बाद उन्हें अलग- अलग करने के लिए चार आदमी लगते थे।
उस दिन रामलीला में भरत मिलाप का खेल चल रहा था। राम अयोध्या जाना नही चाह रहे थे और जगन्नाथ यानी भरत पार्टी मालिक होते हुए भी उनकी अनुनय विनय कर रहे थे। राम और भरत का बहुत बढ़िया संवाद चल रहा था।
गया प्रसाद के चबूतरे पर पड़े तखत पर बैठकर बैजनाथ, कन्नौजिया मास्टर, और प्रयागी रामलीला का आनन्द ले रहे थे। कुछ दूर एक कुर्सी पर बैठे गया प्रसाद भ्रात प्रेम देखकर विव्हल हुए जा रहे थे। उनकी आंखों से आंसू रुकने का नाम नही ले रहे थे। आज उन्हें अहसास हो रहा था कि शराब व्यक्ति को कितना भावुक कर देती है। जैसे ही भरत ने भगवान राम की खड़ाऊँ लेकर अपने मस्तक पर लगायी उन्होंने कनखियों से प्रयागी की तरफ देखा। बैजनाथ और कन्नौजिया मास्टर को राम-भरत संवाद से अधिक रोचक गया-प्रयागी संवाद लगता था। इसलिए मजा लेने के उद्देश्य से बैजनाथ बोले, “देखा! इसे कहते है भाई-भाई का रिश्ता।”
कन्नौजिया मास्टर ने थोड़ा ज्ञान झाड़ते हुए कहा, “ये आदर्श भ्रात प्रेम है भैया।”
प्रयागी को लगा कि गया प्रसाद के इशारे पर उसपर ये व्यंग्य बाण छोड़े जा रहे हैं। प्रयागी ने गया प्रसाद की तरफ इशारा करते हुए कहा, “हर बड़ा भाई राम ही नही होता। कुछ साले रावण से भी बद्दतर भाई पड़े है दुनिया मे।”
गया प्रसाद जो अभी तक त्रेतायुग मे विचरण कर रहे थे प्रयागी के इस वाक्य ने उन्हें धड़ाम से कलयुग के चौथे चरण में पटक दिया। उन्होंने एक भरपूर थप्पड़ प्रयागी के गाल पर जड़ दिया।
प्रयागी ने पास पड़े पत्थर को गया की तरफ सर फोड़ने के उद्देश्य से फेंका, लेकिन नशे के कारण निशाना सही नही लगा और पत्थर का मिलन गया के सिर की बजाय बैजनाथ के चरणों से हुआ।
बैजनाथ “हू हू हू हू” करते हुआ तखत पर लोटने लगे।
गया उठकर रामलीला मंच की तरफ भागे। पीछे-पीछे प्रयागी गालियां देते हुए उसी दिशा में दौड़े। गया ने मंच पर पंहुच कर माइक पकड़ लिया और माइक से प्रयागी को भला बुरा चिल्लाने लगे। राम, भरत सहित सारे कलाकार कुछ समझ पाते इससे पहले प्रयागी पर्दे के पीछे से रावण की चंद्रहास तलवार उठा लाया और गया पर झपटा, गया एकदम से पीछे हट गए। तलवार के वार से पर्दा चर्रर्रर्रर्रर की आवाज से दो टुकड़ों में बंट गया। पर्दे के पीछे अपने रोल का इंतज़ार कर रहे कलाकार और बीड़ी पीता हुआ कैकेयी दिखने लगा। दर्शकों में भगदड़ मच गई। हांथ में खड़ाऊँ पकड़े हुए भरत उर्फ जगन्नाथ इस असमंजस में थे कि खड़ाऊँ लेकर अयोध्या जाऊं या सामान समेट कर कानपुर।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ
#Theपण्डितजी वाले
हंसी नहीं रूकती 😄हमेशा की तरह शानदार भैया👌🙏
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बहुत आभार आपका।
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बहुत शानदार दद्दू
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भैया जी. हँस हँस कर पेट दुखने लगा. आंखों से पानी भी आने लगा.
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लाज़वाब हास्य व्यंग्य, पण्डित जी आप इस युग के हरिशंकर परसाई हो
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वर्तमान दौर के आप श्रेष्ठ व्यंग्य कार हो भैया
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वाह वाह वाह।।आप अद्भुत हैं!😊💐💐👌👌🙏🏻सादर प्रणाम!
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