1.
दाल मँहगी है अगर? कम खाइए,
व्यर्थ मत सरकार को गरियाइये।
हो गया पैट्रोल महँगा, क्या हुआ?
भागिये! खुद फटफटी हो जाइये।।
2.
महँगा हुआ पैट्रोल, तो थोड़ा खरीदिये,
अच्छा विकल्प है, अगर घोड़ा खरीदिये।
ट्रैवलिंग के साथ राइडिंग का लुत्फ लीजिये-
औ’ पाँच किलो लीद रोज़ मुफ्त लीजिये।।
3.
मोदीजी हम अन्दर तक हिल जाते है,
गाड़ी में जब भी पैट्रोल भराते हैं।
जितने में पहले टंकी भर जाती थी-
उतने पैसे में अब सिर्फ चुवाते है।।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।
अस्पताल (हास्य-व्यंग्य कहानी)
वह कुत्ता वाकई कुत्ता ही था। सड़क के बीचो-बीच पहुँच कर उसने अपना निर्णय बदल दिया। मुँह की दिशा के हिसाब से उसे आगे जाना चाहिए था, लेकिन वह मुंह के विलोम की तरफ से उल्टा भागा। पीताम्बर अपनी मोटर साइकिल से ठीक-ठाक गति में आ रहे थे। उन्होंने कुत्ते के पीछे से निकलने का मन पूरी तरह से बना लिया था, किन्तु कुत्ते में बैक गियर भी होता है इसका अंदाज़ा उन्हें नहीं था। कुत्ते के प्रति गाली और भगवान के प्रति विनती दो विपरीत भाव एक साथ उनके मन आये। निर्णय लेने और उसे क्रियान्वित करने का समय उनके पास नहीं था। सब कुछ ईश्वर ही करता है श्रीमद्भगवत गीता का यह महाउपदेश, जिसे समझने में बड़े-बड़े योगी पूरी ज़िंदगी लगा देते है, वे एक सेकेण्ड में समझ चुके थे। शरीर के सभी रंध्रों से उत्सर्जन और ज्ञानेंदियो का विसर्जन हो गया था। नियति के वरण के अतिरिक्त उनके पास दूसरा विकल्प भी नहीं था। अंततः एक भयानक एक्सीडेंट के वे भागीदार सिद्ध हो गए।
मोटर साइकिल सीधे कुत्ते से टकराई। गति अधिक होने के कारण पीताम्बर, कुत्ता और मोटर साइकिल बहुत दूर तक घिसटते चले गए। तीनो का रंग काला होने के कारण कौन ऊपर, कौन मध्य में और कौन नीचे है दूर से समझना मुश्किल था। लोग दौड़कर पास गए, पीताम्बर को मोटर साइकिल के नीचे से निकाला जाने लगा लेकिन उनसे पहले कुत्ता अपनी भाषा में पीताम्बर को गालियां देता हुआ निकला और बचाव दल के एक व्यक्ति के पैर में काट कर एक गली में घुस गया। पीताम्बर को बहुत चोटें आईं थी। वे मोटर साइकिल के नीचे कई जगह से टूटे हुए बेहोश बरामद हुए। आनन-फानन एम्बुलेंस मंगाकर उन्हें अस्पताल के हवाले किया गया।
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पीताम्बर को जब होश आया तो सामने उनकी पत्नी खड़ी थी। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि इतने ज़बरदस्त एक्सीडेंट में वे मर ही गए होंगे। उन्होंने सुन रखा था कि स्वर्ग में अप्सराएं मिलती है किन्तु स्वर्ग में भी वही पत्नी देखकर उन्हें लगा कि यमराज ने उनके साथ चीटिंग की है। जब स्वर्ग में भी वही पत्नी मिले तो मरने का क्या फायदा, चारो तरफ नज़र घुमाकर उन्होंने अप्सराएं तलाश की।
किसी तरह ज़ोर लगाकर पत्नी से बोले, ” तुम यहाँ कैसे? और ये अप्सराएं नर्स की ड्रेस में क्यों है।”
पत्नी चिल्लाकर बोली, “अप्सराएं नहीं ये नर्स ही हैं। तुम पूरी तरह से मरे नहीं हो। ये अस्पताल है।”
फिर भी उन्हें हमेशा की तरह पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ उन्हें लगा कि पत्नी झूठ बोल रही है। उन्होंने पुष्टि हेतु पुनः पूछा, “तो क्या यह स्वर्ग नहीं है?”
पत्नी बोली, “जनरल वार्ड है।”
स्वर्ग में भी जनरल वार्ड मिलना उन्हें दुःखी करने के लिए पर्याप्त था वे सोचने लगे यहां स्वर्ग में भी रिज़र्वेशन पंहुच गया, सवर्ण होने के कारण जनरल वार्ड पकड़ा दिया और अप्सरा के नाम पर पुरानी पत्नी थमा दी। सेविकाएं मिली वह भी नर्स जैसी। शायद इसीलिये स्वर्ग वाली फील नहीं आ रही है।
उन्होंने पुनः पत्नी से पूछा, “तुम मरी थी, या डबल रोल वाला मामला है।”
पत्नी को लगा कि सर में चोट लगने से ज़रूर दिमाग की कोई नस हिल गयी है। बोली, “अरे तुम भी नहीं मरे हो, ये मृत्यु लोक ही है। स्वर्ग की कल्पना तो तुम्हारे जैसे आदमी को करनी भी नहीं चाहिए।”
पीताम्बर को पूरा भरोसा था कि जिस प्रकार की दुर्घटना का शिकार वे हुए थे उसके फलस्वरूप उन्हें मृत्युलोक में रहने का अधिकार नहीं है वे मर चुके हैं, पत्नी से बोले, “स्वर्ग में भी झूठ बोलती हो, शर्म नहीं आती तुम्हे, इसे भी नर्क बनाने पर उतारू हो तुम।”
पत्नी समझ चुकी थी कि सर की चोट गहरी है। बहस करना उसे ठीक नहीं लगा। डॉक्टर ने होश आने पर बुला लेने को कहा था अतः वो चुप-चाप डॉक्टर को बुलाने के लिए चल पड़ी।
पत्नी के जाते ही उन्होंने अपने बायीं ओर के बेड की तरफ देखा, वह खाली था। यह सोचकर कि लोग अब अच्छे कर्म कम करते हैं शायद इसलिए स्वर्ग के बेड खाली पड़े हैं। उन्होंने अपने दाहिनी ओर देखा वह बेड खाली नहीं था उस पर खलील मियाँ थे।
खलील मियाँ धार्मिक प्रवत्ति के व्यक्ति है। अपने काम से काम रखते है। नुक्कड़ की मस्ज़िद में बनी दुकानों में एक दुकान उन्होंने किराए पर ले रखी है। पाँचो वख्त की नमाज़ पढने के बाद जो वख्त बचता है उसमे वे लोहे की संदूक, कूलर, इलमारी आदि के मरम्मत का काम करते है। पिछले दिनों किसी के कूलर की मरम्मत इन्होंने ठीक से नहीं की थी, जिसके फलस्वरूप उसने इनकी मरम्मत कर दी। कूल्हे की हड्डी के फैक्चर के इलाज़ के लिए अस्पताल में भर्ती थे, ऐसा पीताम्बर ने सुना था।
खलील मियाँ को देखकर पीताम्बर ने सोचा शायद इलाज़ के दौरान इनका स्वर्गवास हो गया होगा। फिर अचानक याद आया कि ये तो मुसलमान है, इनके धर्म के हिसाब से इन्हें यहां नहीं होना चाहिए। जिज्ञासा शान्त करने के लिए उन्होंने पूछा, “आप यहाँ?
खलील बोले, “अरे वो कुछ गुंडों ने एक दिन…..”
पीताम्बर बात बीच में काट कर बोले, ” हाँ, हाँ, वह तो मुझे पता है, लेकिन आप मरे कब?”
खलील मियाँ नाराज़ होते हुए बोले, “लाहौल बिला कूबत, तमीज से बात करो।”
पीताम्बर ने इसबार तहज़ीब से बात की, “नाराज़ मत होइए, मेरा मतलब आपका इंतकाल कब हुआ, और आप तो मुसलमान है आपको जन्नत में होना चाहिए यहां स्वर्ग में कैसे?”
खलील मियां ने इसबार इनकी तरफ दया भाव से देखा और पूछा, “जब एक्सीडेंट हुआ था, उस समय आप हेल्मेट नहीं पहने थे क्या? लगता है सर में चोट आयी है तुम्हारे।”
बार-बार सर की चोट सुनकर पीताम्बर ने अपने सर को छूकर चेक करना चाहा लेकिन टूटा होने की वजह से हाँथ नहीं उठा। पैर भी नहीं हिल रहे थे। अब इन्हें लगा कि स्वर्ग नहीं शायद यह नर्क है। जीवित रहते समय अच्छे कर्म न कर पाने का मलाल होने लगा और विचार करने लगे, रोज़ दफ्तर की देर होने के कारण हनुमान चालीसा तक पढने का समय नहीं मिल पाता था। हालांकि एक बार लगातार इक्कीस शनिवार शनि भगवान पर तेल चढाने का पूरा कोर्स किया भी था। लेकिन शायद तेल मिलावट वाला रहा होगा, बजाय फायदे के नुकसान कर गया। इसी लिए नर्क मिला है। फिर अचानक याद आया खलील मियाँ तो नवाजी थे, इन्हें स्वर्ग जाना चाहिए था ये यहां नर्क में कैसे? इन्हें तो पूरी कुरआन भी याद है। लेकिन याद होने से क्या होता है। डॉक्टरों को सारी दवाइयाँ याद होती है फिर भी बीमार तो वे भी होते हैं।
तब तक उनकी पत्नी डॉक्टर को लेकर आ चुकी थी, उन्होंने डॉक्टर से सीधा सवाल किया, “क्या यह नर्क है?”
डॉक्टर मुस्कुराकर बोला, “सरकारी अस्पताल है भाई। नर्क ही समझो।”
पीताम्बर ने फिर पूछा, “तो क्या मैं मरा नहीं हूँ?”
इंजेक्शन भरते हुए डॉक्टर ने जवाब दिया, “अभी नहीं, अभी ज़िन्दा हो। हालांकि ज़िन्दा भी क्या हो, ये समझ लो कि मरने की प्रक्रिया में हो।”
पीताम्बर की कुछ समझ में नहीं आ रहा था, पूछा, “वो, उस एक्सीडेंट का क्या परिणाम हुआ था, क्या मैं बच गया उसमे।”
इसबार उनकी पत्नी बोली, “ऐसे कैसे मरोगे? अभी तक की रिपोर्ट के अनुसार दोनों टांगे और बायाँ हाँथ टूटा है बस। दिमाग की रिपोर्ट शाम को मिलेगी। देखना है उसमे क्या निकलता है। दिमाग ही निकल आये वही बड़ी बात है। मुझे तो लगता है गोबर निकलेगा।”
पीताम्बर को अपना बचना उतना अच्छा नहीं लगा। पैरों के टूटने से ज़्यादा दुःख उन्हें बायाँ हाँथ टूटने का था। उन्हें अहसास हुआ कि दाहिने हाँथ की अपेक्षा बाएं हाँथ को अति महत्वपूर्ण और संवेदनशील कार्य आवंटित किये गए हैं। दाहिने हाँथ के काम निपटाने के लिए किसी की भी मदद ली जा सकती है लेकिन बाएं हाँथ के काम की मदद कौन करेगा? वे सब कैसे होंगे?
डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाने के लिए उनका दाहिना हाँथ अपनी ओर खीचा पीताम्बर चिल्लाया, “यही हाँथ ठीक-ठाक बचा है इसे भी बर्बाद कर दोगे क्या।”
डॉक्टर के इन्हें चुप रहने का इशारा किया और इंजेक्शन लगाते हुए बोले, “हेल्मेट पहन कर ही मोटर साइकिल चलानी चाहिए। देखिये क्या निकलता है सिर की रिपोर्ट में। मुझे तो लगता है कुछ गड़बड़ ज़रूर है।”
पीताम्बर की पत्नी बोली, “इतना पागल तो ये शुरू से थे डॉक्टर साहब। मुझे लगता है रिपोर्ट नार्मल ही होगी।”
डॉक्टर ने पीताम्बर की पत्नी से कहा, “अभी कुछ कहा नहीं जा सकता, रिपोर्ट लाकर मुझे दिखाना, अंदाज़ लगाकर हम लोग इलाज़ नहीं करते। इनकी ऊट-पटांग बातो से मुझे लग रहा है कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर है दिमाग में। वैसे भी इतनी जगह से टूट चुके है, इनकी सर्विसिंग तो पूरी ही होगी। पूरा फार्मेट करके नए साफ्ट वेयर अपडेट करने पड़ेगे और कुछ हार्ड वेयर भी बदले जायेंगे कुल मिलाकर इलाज़ लम्बा चलेगा।”
खलील मियाँ जो बहुत देर से शान्ति पूर्वक लेटे थे, बोले, “अगर दिमाग में कुछ गड़बड़ निकला तब तो फिर बिजली के झटके लगाने पड़ेगे, दिमाग सेंटर में लाने के लिए। बहुत लम्बा खर्चा आता है दिमाग के इलाज़ में। मेरे खालू एक बार पागल हो गए थे, उन्हें रोज़ बिजली का…….”
“अबे, ज़्यादा ज्ञानी मत बनो, अपने काम से काम रखो, मैं बिजली विभाग में ही हूँ मुझे बिजली मुफ़्त मिलती है, आप उसकी चिन्ता न करो। मैं पागल नहीं हूँ समझे।” पीताम्बर खलील मियाँ पर बुरी तरह से भड़कते हुए चिल्लाए।
खलील मियाँ बोले, “इंशा अल्लाह आपकी बात सच हो, वैसे एक बात बताऊँ, मरते मर गए लेकिन मेरे खालू ने भी कभी नहीं माना कि वो पागल हैं। ये तो डॉक्टर डिसाइड करते हैं।”
पीताम्बर गुस्से से चिल्लाया, “अबे मुझे कोई दिक्कत नहीं है।”
खलील मियाँ धीरे से बोले, “पागल होने पर दिक्कतें तो दूसरों को होती है।”
पीताम्बर को क्रोध आना स्वाभाविक था। वो सीधे-सीधे खलील मियाँ को गालियां देने लगे। मौक़ा देखकर डॉक्टर ने उन्हें एक और इंजेक्शन लगा दिया। शायद उसमे नींद की दवा थी। पीताम्बर खर्राटे लेने लगे।
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प्राइवेट हॉस्पिटल और सरकारी अस्पताल में एक मूल अंतर यह है कि प्राइवेट हॉस्पिटल में साधारण से साधारण रोग को गम्भीर बताकर इलाज किया जाता है, जबकि सरकारी अस्पताल में गंभीर से गंभीर रोग का इलाज भी साधारण तरह से होता है। पीताम्बर कई जगह से टूटे थे, लेकिन अस्पताल सरकारी होने के कारण डॉक्टरों के व्यवहार में कभी गंभीरता नहीं दिखाई दी।
पीताम्बर को प्लाट समझ कर डॉक्टरों ने इनपर काम किया था। ऑपरेशन के नाम पर शरीर में खुदाई की गयी, टांगों और हाँथ में सरिया डाली गई और फिर उसके बाद प्लास्टर कर दिया गया। यह बात अलग है कि बाहर से महंगी दवाएं खरीदने में उनका प्लाट बिक गया। भोजन से लेकर उसके विलोम तक सारे काम उन्हें बेड पर ही सम्पादित करने पड़ते।
जिसने भी सुना पीताम्बर दुर्घटनाग्रस्त होकर अस्पताल में भर्ती है देखने ज़रूर आया। लोग अपने चेहरे पर कृतिम दुःख चिपका कर आते और पीताम्बर को राय देकर, अंधा सिद्ध करके, या पागल बताकर चले जाते। पंडित रमाकान्त द्विवेदी जिस समय उन्हें देखने पंहुचे उस समय पीताम्बर दर्द से कराह रहे थे।
द्विवेदी जी अपने आप को विद्वान कहलाना बहुत पसंद करते है। अपने धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म को वे घास नहीं डालते, अपने धर्म पर घास के साथ-साथ गोबर भी डालते हैं। अंग्रेजी के इस कदर खिलाफ हैं कि एक शब्द भी अंग्रेजी का नहीं बोलते। हिन्दी को विश्व की सबसे समर्थ भाषा और संस्कृत को सब भाषाओँ की जननी सिद्ध करने का बीड़ा उठाये हैं। ट्रेन को लौह पथ गामिनी और रिक्शे वाले को त्रिचक्र वाहन चालाक ही कहते हैं। ज्ञान के नाम पर संस्कृत के चार पांच श्लोक याद है जिन्हें मौक़ा देखते ही झोक देते हैं, और फिर परिस्थिति के अनुसार उसका गलत अर्थ फिट कर देते हैं।
उन्हें देखते ही पीताम्बर ने प्रणाम सा मुंह बनाया, उन्होंने आशीर्वाद सा हाँथ से इशारा किया और पूछा, “ये सब कैसे हुआ?”
पीताम्बर विगत सात दिनों में सात सौ बार एक्सीडेंट का आँखों देखा और शरीर पर भुगता वृतांत लोगों से बता चुके थे इसलिए ऊबे हुए थे, बोले, ” वैसे तो आप आते नहीं अतः यह उपक्रम करना पड़ा।”
द्विवेदी जी ने ज्ञान बघारा, “कर्मण्ये वादिकारस्ते मा फलेषु कदाचने। सब कुछ ईश्वर करता है। प्राणी तो माध्यम मात्र है। वैसे आपकी शल्य चिकित्सा कब हुई?”
पीताम्बर ने संक्षिप्त उत्तर दिया, “परसों।”
द्विवेदी जी पुनः बोले, “पीड़ा प्रचुर है क्या?”
पीताम्बर के अजीब सा मुंह बनाते हुए कहा, “बहुत दर्द है।”
द्विवेदी जी ने स्वयं को ज्ञानी सिद्ध करते हुए एक श्लोक पढ़ा और जिसका अर्थ इसतरह बताया, “न राजा छीन सकता है, न भाई बाँट सकता, न चोर चुरा सकता है। पीड़ा और विद्या ऐसा धन है जिसे स्वयं ही झेलना पड़ता है।”
पीताम्बर ने कराहते हुए उनकी तरफ इस भाव से देखा जिसका अर्थ था साले अगर ठीक होता तो आज तेरे ऊपर मोटर साइकिल चढ़ा देता। लेकिन विवश होकर बोलना पडा, “आप ठीक कह रहे हैं।”
द्विवेदी जी पुनः बोले, “इसीलिए मैं पैदल चलता हूँ, सुना है कि आप मदिरापान किये थे उस समय, अतः कुत्ता देख नहीं पाये।”
पीताम्बर की समझ में नहीं आ रहा था कि ये संवेदना व्यक्त करने आया है या तपाने। बोले, “अरे सुबह-सुबह हुआ है एक्सीडेंट।”
द्विवेदी जी तपाक से बोले, “सुबह तो बिल्कुल नहीं पीनी चाहिए।”
पीताम्बर गुस्से से बोले, “अबे मैं सुबह नहीं पीता, कुत्ता उल्टा भागने लगा था।”
द्विवेदी जी व्यंग्यात्मक मुस्कुराते हुए बोले, “वो कुत्ता था तुम तो मनुष्य थे, तुम्हे देख कर चलना था। ते नर पशु पुच्छ विशाण हीनः।”
पीताम्बर की इक्षा हुई कि प्लास्टर सहित इसके लात मार दें लेकिन दर्द अधिक था इसलिए ऐसा नहीं किया। इसबार खलील मियाँ बोले, “जो होना होता है होकर रहता है। मैं तो अपनी दुकान में चुपचाप बैठा था फिर भी कूल्हा टूट गया।”
द्विवेदी जी खलील मियाँ से बोले, “अरे…..कूल्हा टूट गया! यह तो वाकई बहुत बुरा हुआ। कूल्हे की हड्डी टूटने के बाद कौन बचता है। मेरे फूफा तो बेचारे इसी में मरे थे। डॉक्टरों ने ऑपरेशन करके चाइनीज़ कूल्हा लगा दिया था। केवल साल भर चले, फिर चले गए।“
खलील मियाँ का चेहरा उतर गया। बोले, “फिर अब क्या किया जा सकता है। कूल्हा तो मेरा भी बदला गया है, कैसे पता चले कि नकली लगा है या असली?”
द्विवेदी जी मुस्कुराते हुए बोले, “आसान है, अगर एक साल से ज़्यादा आप ज़िन्दा रहे तो समझिये असली था। वर्ना…….”
खलील मियाँ को पहले से अहसास था कि कूल्हा उतना अच्छा फिट नहीं हुआ है, उन्हें शक था कि उनके साइज़ से एक नंबर छोटा कूल्हा लगाया गया है और अब नकली कूल्हे की बात ने उन्हें और विचलित कर दिया। झल्लाहट मिश्रित दुःखी स्वर में बोले, “पर अब करूँ क्या?”
द्विवेदी जी बोले, “करना क्या है अब जितनी ज़िंदगी बची है उसमे अपने अल्लाह को याद कीजिये।”
खलील मियाँ बुरी तरह डर गए। उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती हुए पच्चीस दिन हो गए थे। डॉक्टर कुछ संतोष जनक उत्तर भी नहीं दे रहे थे। उनसे तकलीफ बताने पर वे एक इंजेक्शन ठोंक देते थे। इंजेक्शन के डर से तकलीफ बताने में भे उन्हें तकलीफ होती थी।
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पीताम्बर जब सो कर जगे उन्हें भजन के विलोम सुनाई दिये। खलील मियाँ बुरी तरह गालियां बोल रहे थे। गालियों के शोर से ही पीताम्बर की आँख खुली थी। खलील मियाँ बहुत तपे जान पड़ रहे थे। वे जितना कुछ बोल रहे थे उसका साठ प्रतिशत गालियां थी। पीताम्बर ने ध्यान दिया तो उन्हें अहसास हुआ कि खलील मियाँ जो गालियां कह रहे हैं वे पारम्परिक गालियां नहीं हैं। गालियों में नये-नये प्रयोग और मौलिक चिंतन का समावेश बहुत ही बेवकूफी से किया गया है। पुलिस अगर ये गालियां सीख ले तो अपराध का ग्राफ स्वतः नीचे आ जाए। कुल मिलाकर श्रृंगार रस के गद्य छंदों का वाचन वे वीररस के माध्यम से कर रहे थे।
पीताम्बर ने उत्सुकतावश कारण जानना चाहा, “क्या हुआ मौलाना साहब?”
खलील मियाँ बोले, “कोई छड़ी चुरा ले गया। कल ही पांच सौ अस्सी की मंगाई थी, चोरी की भी हद हो गई।”
पीताम्बर बीच में बोले, “कोई बात नहीं ज़रूरतमंद ले गया होगा। कोई उस छड़ी से स्नूकर तो खेलेगा नहीं। गरीब होगा बेचारा। छोड़िये जाने दीजिये। समझ लो कि किसी गरीब को दान कर दी।”
खलील मियाँ चिल्लाये, “मज़ाक मत कीजिये। अभी कल से छड़ी के सहारे चलना शुरू किया है और आज कोई छड़ी ही चुरा ले गया। अगर मिल जाए तो साले के सौ जूते मारें।”
पीताम्बर बोले, “बात सही कह रहे हो अब तो जूतों से ही मारना पडेगा, क्योंकि छड़ी तो वो ले ही गया।”
खलील मियाँ ने गुस्से में कहा, “डाइबटीज के कारण बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता है। अब पहले छड़ी मंगाए तब टॉयलेट जाएँ। कल ही नयी छड़ी मंगाई थी, केवल दो बार ही इस्तेमाल कर पाया था। मेरे तो पाँच सौ अस्सी चले गए। मुझे महँगा पड़ गया।”
पीताम्बर ने चुटकी ली, “पांच सौ अस्सी में केवल दो बार यानी दो सौ नब्बे रुपये प्रति लघुशंका! वाकई बहुत महँगी है।”
खलील मियाँ सीधे-सीधे पीताम्बर पर चिल्लाने लगे, “आप तफ़रीह कर सकते है, क्योंकि आपका कौन क्या बिगाड़ लेगा। आप तो पहले से टूटे फूटे पड़े हो। मेरा तो नुकसान हो गया।”
इतने में एक नर्स दूर से बोलते हुए आयी, “आप में से खलील अहमद कौन है।”
पीताम्बर ने उनकी तरफ इशारा किया, “अभी तक को यही खलील हैं। आज कोई इनकी छड़ी चुरा ले गया यह हरकत इन्हें बहुत खली हैं।”
खलील मियाँ ने इनकी तरफ घूर कर देखा और नर्स से बोले, “पांच सौ अस्सी की कल ही मंगाई थी कोई…”
नर्स ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। बोली, “आपके डिस्चार्ज के कागज़ तैयार है आप काउंटर पर जाकर हिसाब कीजिये और अपना रास्ता नापिये।”
खलील मियाँ नर्स से बोले, “लेकिन मैं अभी पूरी तरह से ठीक कहाँ हुआ हूँ। अभी बहुत तकलीफ है।”
नर्स एक कागज़ देते हुए बोली, “जितना ठीक हुए हो उतना बहुत है। संतोष करो और निकलो।”
खलील मियाँ चिल्लाये, “ऐसे कैसे डिस्चार्ज करेंगे। छड़ी के बिना जायेंगे कैसे?”
नर्स गुस्से में चिल्लाती हुई चली गयी, “तो नयी मंगवा लो, और अपनी दुकान फ़ौरन समेटो। यह अस्पताल है, खाला जी का घर नहीं है कि जब तक चाहो पड़े रहो।”
पीताम्बर ने खलील मियाँ से धीरे से कहा, “मैंने सुना है कि इन लोगो का दुकानों से मामला सेट रहता है, एक छड़ी तीन-तीन बार बिकती है।”
खलील मियाँ ने उत्सुकता ज़ाहिर की, “मतलब?”
पीताम्बर ने समझाया, “जितनी दवाई आपने अभी तक मंगाई है अगर उतनी सब खाई होती तो आप क्या पूरे शहर को कूल्हे की समस्या से निजात मिल जाती।”
खलील मियाँ ने नज़दीक मुँह लाकर कहा, “मैं आपकी बातों को कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ, ज़रा खुल कर आइये।”
पीताम्बर ने धीरे से कहा, “आपको मालूम है कि ये लोग ऑपरेशन में बेहोश क्यों करते हैं?”
खलील मियाँ ने अजीब सा मुँह बनाया जिसमे दो अर्थ एक साथ निकल रहे थे “नही” और “अल्लाह जाने।”
पीताम्बर ने आगे कहा, “ऑपरेशन के समय बेहोश इसलिए करते हैं ताकि मरीज़ जान न पाये कूल्हा इन्डियन फिट किया जा रहा है या चाइनीज़। चाइनीज़ कूल्हे में कोई ख़ास खराबी तो नहीं होती बस थोड़ा छोटे होते है और सस्ते आते हैं। साल डेढ़ साल काम भी करते हैं। मैंने सुना है, एक बार किसी के बन्दर का कूल्हा लगा दिए। जब बेचारे को होश आया तो कूदने लगा। घर वाले समझे दर्द के कारण उछल रहा है थोड़ी देर बाद वह पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ से उसका शरीर नीचे गिरा और प्राण ऊपर से ही ऊपर निकल गये।”
खलील मियाँ घबरा गए, बोले, “मुझे कौन सा लगा है, यह कैसे पता चले।”
पीताम्बर का उद्देश्य उन्हें तपाना ही था, उनका निशाना सटीक लगा था, आगे बोले, “प्राइवेट हॉस्पिटल में चेक करा लेना। पहले आपने पूछा नहीं वर्ना बेहोशी के बिना ऑपरेशन कराने की मैं सलाह देता। मैंने तो अपने सामने हाँथ और पैर में स्टेनलेस स्टील की सरिया डलवाई हैं। मुझे मालूम है ये सब क्या गड़बड़ी करते हैं।”
खलील मियाँ को अहसास हुआ कि कूल्हे का दर्द अब और बढ़ गया है। उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि उन्हें नकली कूल्हे लगाकर ठगा गया है। जबकि उनसे पैसे असली कूल्हे के लिए गए हैं।
पीताम्बर ने खलील मियाँ से पूछा, “पेट में दर्द तो नहीं है?”
खलील मियाँ बोले, “कोई ख़ास दर्द नहीं हैं, हाँ, अब उतना अच्छा साफ़ नहीं होता। शायद दवाओं की गर्मी के कारण।”
पीताम्बर बोले, “प्राइवेट हॉस्पिटल में किडनी वगैरह भी चेक करा लेना।
ऑपरेशन की बेहोशी में किडनी, लीवर, ह्रदय, फेफड़े तक भी निकाल लेते है कभी-कभी।”
खलील मियाँ को अहसास हुआ कि वे बहुत बुरी आफत में फंस गए हैं। उनके अंदर के बहुत से महत्वपूर्ण अंग चुरा लिए गए हैं। अंदर कुछ भी बचा नहीं है। हड्डियों पर चढी हुई खाल भी उन्हें प्लास्टिक की लगने लगी। उन्होंने फ़ौरन अपने लड़के को फोन करके बुलाया और बची हुई दवाइयाँ और शेष भौतिक सामान समेट कर घर चलने का आदेश दिया।
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पीताम्बर को अस्पताल में पूरे पच्चीस दिन हो गए थे। इन पच्चीस दिनों में कितने मरीज़ आये और चले गए पर ये अपने पावों पर प्लास्टर चढ़ाये अंगद के पाँव की तरह जमे हुए थे। खलील मियाँ के जाने के बाद से इन्हें कभी-कभी थोड़ा अकेलापन ज़रूर महसूस होता था। लेकिन धीरे-धीरे अभ्यस्त होने पर उन्हें मज़ा आने लगा। जो नए मरीज आते सीनियर होने के नाते वे उन्हें व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर अस्पताल की दुश्वारियां से विधिवत अवगत कराते। डॉक्टर ने उन्हें तीन माह आराम और शेष ज़िंदगी भारी काम न करने की हिदायत दी थी। चूंकि ये सरकारी नौकरी में थे इसलिए काम का तनाव नहीं था।
वर्तमान समय में खलील मियाँ के बेड पर जो भर्ती था दरअसल वह भर्ता था। बिखरे नहीं इसलिए डॉक्टरों ने उसे पट्टियों से बाँधा हुआ था। जिस दिन से वह भर्ती हुआ था पीताम्बर स्वयं को स्वस्थ महसूस कर रहे थे। क्योंकि तुलनात्मक रूप से उसकी हालत ज़्यादा गंभीर थी। उसके शरीर की लगभग सभी हड्डियां, जो टूट सकती थी, टूट चुकी थी। कृतिम ऑक्सीजन का चोंगा मुंह में लगा हुआ था। भोजन आदि नलियों के माध्यम से शरीर के अंदर डाला जाता था और उत्सर्जन की समस्त क्रियाएँ भी नलियों से ही होती थी। कुल मिलाकर उसे देखने से ऐसा जान पड़ता था कि वह विज्ञान के माध्यम से यमराज से युद्ध लड़ रहा है।
पूछने पर पीताम्बर को ज्ञात हुआ कि इस व्यक्ति ने नशे की हालात में पैदल ही ट्रक को टक्कर मार दी। चूंकि ट्रक ड्राइवर इनसे ज़्यादा नशे में था इसलिए ये बेचारे हार गए। जिस प्रकार की उसकी हालात थी उससे जनरल वार्ड मैच नहीं करता था। नियमतः इन्हें सघनचिकित्सा कक्ष में होना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्यवश आईसीयू में मंत्री का कोई रिश्तेदार आ गया था इसलिए इन्हें यहां शिफ्ट किया गया। इसी अस्पताल में दूसरा आईसीयू भी है, लेकिन आकस्मिक चिकित्सा के लिए और रसूखदार अमीरों के दुर्घटनाग्रस्त होने के इंतज़ार में उसे खाली रखा गया था।
तीमारदारों के परिधानों और रहन-सहन से उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं जान पड़ रही थी, इसी कारण डॉक्टरों एवं अस्पताल के अन्य कर्मचारियों का व्यवहार उनके प्रति उपेक्षित सा रहता था। पीताम्बर के मन में उसके प्रति करुणा का भाव आना स्वाभाविक था।
एक दिन सुबह जब पीताम्बर जगे तो उन्हें उसका बेड खाली दिखाई दिया। पीताम्बर ने सोचा संभव है उसे आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया हो उसकी हालत देखते हुए जोकि आवश्यक भी था।
नर्स ने पीताम्बर को बताया कि आज उन्हें डिस्चार्ज किया जाएगा, क्योंकि अब इन्हें बेड रेस्ट ही करना है और दवाएं खानी है, अतः यह काम वे घर में भी कर सकते है।
व्हीलचेयर पर पीताम्बर को रखा गया और उनकी पत्नी उसे धक्का देते हुए अस्पताल के गेट की तरफ बढ़ रही थी। अचानक पीताम्बर को किसी महिला का ह्रदय विदारक रुदन सुनाई पड़ा आवाज़ कुछ जानी पहचानी सी लगी, इसलिए उन्होंने उसे ध्यान से सुनने का प्रयास किया। फ़ौरन याद आया यह तो पट्टियों लिपटे उसी व्यक्ति की पत्नी की आवाज़ है जो रो-रो कर कह रही थी “अरे रात में ऑक्सीजन क्यों निकाली मैं कह रही थी आज जेवर गिरवी रख कर पूरा पैसा जमा कर दूंगी। केवल सात सौ रुपये की ऑक्सीजन के लिए…….”
पीताम्बर इसके आगे नहीं सुन सके। व्हीलचेयर सहित गेट के बाहर आ गए, और सोचने लगे निःसंदेह इस अस्पताल ने उनके शरीर के दर्द को समाप्त किया है लेकिन आत्मा को जो दर्द मिला है उसकी दवा कहाँ मिलेगी।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।

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जलेबीनामा (हास्य-व्यंग्य लघुकथा) -राजेन्द्र पण्डित

चौकोर समोसे, ठोस कड़ी आइसक्रीम, च्युंगम के टक्कर की रसमलाई और छेनी-हथौड़ी से तोड़कर खाने लायक खस्तों की अपार सफलता के बाद, आज पत्नी ने जलेबी बनाने में प्रयुक्त होने वाली सामिग्री की लिस्ट थमाते हुए कहा, “आज खाना-वाना नही बनेगा। जलेबी बनाना यू ट्यूब से सीखा है। फटाफट ये सब ले आओ। गरमागरम जलेबी बनाएंगे।”
मैंने चुपचाप लिस्ट जेब के हवाले की और ये सोचता हुआ निकल पड़ा कि कोरोना से भारत मे मृत्युदर भले ही तीन प्रतिशत है पर हलवाईदर 97 प्रतिशत से अधिक ज़रूर है। जिस प्रकार वैज्ञानिक नयी दवा का प्रयोग सर्वप्रथम चूहों पर करते है, ठीक उसी तर्ज पर पत्नियां नयी डिश का पति पर।
दुकानदार ने सामान का थैला पकड़ाते हुए बताया कि, “सारा सामान दे दिया है, सिर्फ ईनो मेरे पास नही है उसकी शीशी सामने मेडिकल स्टोर से खरीद लेना।”
मेडिकल स्टोर पर ज्ञात हुआ कि जब से लॉक डाउन शुरू हुआ है ईनो कि खपत बढ़ गई है। सप्लाई कम है, इसलिए डाइजीन से काम चलाओ। ईनो से डाइजीन अधिक एफेक्टेबल होता है। मुझे मालूम था कि कैमिस्ट हमेशा जो दवा उनके पास नही होती है उसका सबटिट्यूट दे देते है सो बिना किसी हुज्जत के मैंने एक बड़ी शीशी डाइजीन की खरीद ली।
झोले से डाइजीन की शीशी निकलते ही पत्नी ने मुझे फिर अहसास दिलाया कि मैं मूर्ख हूँ, 25 साल पहले शादी में उसे चढ़ावे का जो हार दिया गया था, वह बिल्कुल हल्का था, दहेज की मोटर साइकिल मेरी मूर्खता के कारण चोरी हुई थी। दो साल पहले भूकंप से पीछे की दीवार मेरी ही गलती के कारण गिरी थी, अगर मैंने ठीक से उसकी तराई की होती तो दीवार मजबूत होती। ये तो वो है, जो निर्वाह कर रही है, अगर कोई और होती तो….. फिर अंत मे उसने बताया कि, “जलेबी को करारी करने के लिए ईनो डाला जाता है।”
मैंने कातर भाव से कहा, “कैमिस्ट कह रहा था कि डाइजीन ईनो से अच्छा काम करता है। एक बार ट्राई करने में क्या हर्ज है।”
“अरे उसे क्या मालूम कि जलेबी बनाने के लिए ईनो मांग रहे हो। वो तो तुम्हारा चेहरा देख कर समझा होगा कि कब्ज है। इसलिए ईनो नही था तो डाइजीन पकड़ा दी। दूसरी दुकान से चुपचाप ईनो लेकर आओ।”
खैर… ईनो आया, जलेबी की पहली खेप मेरे सामने डाली गई। बाकी तो ठीक था पर जलेबी पतली अधिक थी और जलाव थोड़ा मोटा। इसलिए जलेबी के अंदर ठीक से प्रविष्ट नही हो पाया था। मैंने पत्नी से आग्रह किया कि “एक कप जलाव दे दो।”
पत्नी ने “क्यों” के आगे चार-पांच प्रश्नचिन्ह लगाकर फौरन कारण जानना चाहा।
मैंने डरते हुए कहा, “जलेबी मैं हूँ और जलाव तुम। दोनों का ठीक से मिलन नही हो पा रहा है। अगर कप में जलाव मिल जाता तो बीच-बीच मे सुड़कता रहता। जलेबी भी मीठी लगती।”
“मतलब जलेबी पतली है तो जलाव भर नही रहा है अंदर। यही ना?” कहते हुए उसने कोन का छेद कैची से काटकर बड़ा कर दिया।
ये क्या…… अब एक-एक गोला तीन-तीन पाव का बनने लगा। पूरे घर मे हाय तौबा मच गई। छोटे से बड़े तक सबने मुझपर चढ़ाई कर दी। सारा दोष मुझ पर मढ़ दिया गया। फिर मेरे साथ जो हुआ उसके परिणाम स्वरूप मैं कैमिस्ट के यहां मूव लेने जा रहा हूँ। मुझे मालूम है, वह मूव की जगह आयडेक्स देगा।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।
#Theपण्डितजी वाले।
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कल्लन का कोट (लघुकथा)
नाम तो उनका कुछ और था लेकिन कहते सब उन्हें कल्लन ही थे। कुछ लोग प्यार से तो कुछ उसके विलोम के कारण उन्हें इस नाम से पुकारते थे। कल्लन उस समय पाँचवी और अंतिम कक्षा में बैठते थे। वे और उनके पिता इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि ज़्यादा पढ़ाई लिखाई करने से कोई लाभ नही होता सभी पढ़ने वाले कलेक्टर नही बनते और सभी न पढ़ने वाले गरीब नही होते। पढ़ाई बस इतनी होनी चाहिए कि अगर सरकार सारे नोटों का रंग एक जैसा कर दे, तब भी यह पहचान रहे कि कौन सा नोट कितनी वैल्यू का है।
कल्लन के पास एक कोट था। जिसे वे पहनते नही थे, बल्कि धारण करते थे। दीपावली के अगले दिन से होली के एक दिन पूर्व तक वे उसी कोट में निवास करते थे। इस अवधि के दौरान उन्हें बिना कोट के, और कोट को बिना कल्लन के किसी ने भी नही देखा। कर्ण के कवच वाला आइडिया महाभारत के सीरियल में कल्लन के कोट को देखकर ही चुराया गया जान पड़ता था।
कल्लन का कोट समानता का अद्भुत उदाहरण था, स्कूल हो या खेल, तिलक हो या तेरहवीं, भोजन हो या उसका विलोम, वे समान रूप से उसे धारण किये रहते थे। चूंकि कोट के अंदर कही पर एक स्टीकर लगा था कि “ड्राई क्लीन ओनली” और गांव में ड्राई क्लीनिंग की सुविधा नही थी इसलिए उसे कभी धुलवाया नही जा सका। इससे और कोई तकनीकी दिक्कत तो नही थी बस यह अनुमान लगाना मुश्किल था कि कोट का वास्तविक रंग कौन सा है।
एक दिन कन्नौजिया मास्टर की इच्छा हुई कि बच्चों से पहाड़े सुने जाएं। कल्लन के लिए पूरी पढ़ाई ही पहाड़ थी तो पहाड़े कहां से याद होते। चौदह पंचे तक आते-आते उनकी गाड़ी फंस चुकी थी। कन्नौजिया मास्टर ने घूर कर कल्लन की ओर देखा। कल्लन ने कुशल ड्राइवर की तरह बैक गियर लगाया और थोड़ा पोछे लेकर फिर एक ज़ोर लगाया। मगर चौदह पंचे का दलदल इतना ढीठ था कि पहिया जगह पर घूमता रहा, आगे न बढ़ा। जब पैतालीसवीं बार उन्होंने चौदह पंचे कहा और आगे न बढ़े तो कन्नौजिया मास्टर को अहसास हुआ कि वे सरकार से हराम की तनख्वाह ले रहे है। अतः अब उन्हें भी कुछ करना चाहिए। वे अपनी कुर्सी से सीधे कल्लन कि तरफ कूदे। कल्लन ने छात्र धर्म का निर्वाह नही किया और अपने स्थान से हट गया। नियमतः कन्नौजिया मास्टर को कल्लन पर लैण्ड होना था, किन्तु नियतितः उन्हें जमीन पर लैण्ड होना पड़ा। लैंडिग के वक्त किसी का खुला कलम भी ठीक उसी स्थान पर पड़ा था। कलम शस्त्र से अधिक मारक होता है, यह स्वतः सिद्ध हो चुका था।
कल्लन को कन्नौजिया मास्टर के क्रोध का आभास हो चुका था। बस्ते का मोह त्याग कर वह अपने कोट सहित स्कूल के गेट की तरफ भागा। कन्नौजिया मास्टर जो कि अभी एक बटा तीन ही उठ पाए थे, कल्लन की तरफ झपटे कल्लन का कोट उनके हाथ मे फंस चुका था। देखते ही देखते गुरु ने शिष्य को गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का प्रैक्टिकल करा दिया। कल्लन कोट सहित जमीन पर आठो खाने चित्त पड़े थे (चारो खाने कल्लन और चारो खाने कोट के मिलाकर)।
इसी दौरान मुजीब भाई ने कन्नौजिया मास्टर को लाकर उनका बेंत पकड़ा दिया। कल्लन और मुजीब की पुरानी खुन्नस थी, जिसमे आज कन्नौजिया मास्टर किसी भाड़े के गुंडे की तरह प्रयुक्त हो रहे थे। बेंत के हर वार पर कोट ढाई सौ ग्राम धूल उगल दे रहा था। देखते ही देखते मैरून कलर सा दिखने वाला कोट नेवी ब्लू कलर का हो गया। ड्राई क्लीनिंग कैसे होती है कल्लन सीख चुके थे।
राजेन्द्र पण्डित
#Theपण्डितजी वाले।