अन्य कापियों की अपेक्षा भूगोल की कॉपी थोड़ी लम्बी होती थी, इसलिए प्रेमपत्र लिखने के लिए उसके पन्ने बड़े मुफीद माने जाते थे उनदिनों। मुजीब ने उसी कॉपी से एक पेज फाड़ा किन्तु इश्क के चक्कर मे यह ध्यान भी नही दिया कि दो पन्ने एक मे ही जुड़े होते है और दूसरे पेज में विश्व का मानचित्र बना है, उसने भी उनका साथ छोड़ दिया है। चूंकि उस समय तक स्मार्ट फोन का अविष्कार नही हो पाया था, इसलिए आशिक अपनी भावना सिर्फ लिखा-पढ़ी में ही व्यक्त करते थे। आमने-सामने आई लव यू बोलने का चलन सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित था।
“खून से लिखा है स्याही न समझना” नामक अमर शेर से पत्र की धुंआधार शुरुआत करने के बाद मुजीब ने अपने दिल की बेकरारी पर प्रकाश डालते हुए प्यार की जीवन मे उपयोगिता एवं समाज की दखलंदाजी का तुलनात्मक अध्ययन किया। डायग्राम के तौर पर एक पान बनाया और उसमे एक तीर घुसेड़ दिया। प्यार के दुश्मनों के हथकंडे, सच्चे प्यार की परिभाषा के साथ कोटेशन में चार शेर, फिर भविष्य के सपने, प्यार न मिल पाने के दुष्परिणाम और जीवन की नश्वरता पर आख्यान देते हुए अंत मे “फूल है गुलाब का खराब न करो, टाइम हो तो छुट्टी के बाद तालाब के किनारे मिलो” से पत्र समाप्त किया। पेज दोनों तरफ इस कदर भर गया था कि तिल रखने की भी जगह न थी। किसी तरह हिलाकर और दबाकर थोड़ी सी जगह का जुगाड़ करके उसमें नाम मुजीब अहमद रोल नंबर सत्रह कक्षा पांच लिख कर पत्र समाप्त करना पड़ा।
अब मुजीब के आगे समस्या यह खड़ी हुई कि इसे कैसे और किस को दिया जाए। वह अंदर-अंदर अनेकों को प्यार करता था, किन्तु पत्र मात्र एक था। कन्नौजिया मास्टर के कलम की लाल इंक भी समाप्त हो चुकी थी, इंक चुराने जाने पर पेन की चोरी भी पकड़ी जाने का खतरा था। मजबूरी में उसे एक ही पत्र से संतोष करना पड़ रहा था। पत्र को एक पत्थर में बांधकर अपने अंतःकरण में मजनू, फरहाद आदि इश्क के इष्टों का स्मरण करते हुए मुजीब ने उसे कन्या विद्यालय के अंदर फेंक दिया। पत्थर ने अन्दर पँहुचते ही फ़ौरन अपनी उपस्थिति दर्ज की, एक दम से अंदर चिल्लाहट मच गई। लड़कियों के रोने और पकड़ो-पकड़ो की आवाज़ सुनकर मुजीब अपने घर की तरफ भागा।
अगले दिन कन्नौजिया मास्टर कक्षा पांच के बच्चों को पत्रों के प्रकार और उनके लिखने का तरीका सिखा रहे थे, ठीक उसी समय कन्या विद्यालय की प्रधानाचार्या उनकी कक्षा में आ गयीं। और कन्नौजिया मास्टर की मेज पर मुजीब वाली चिट्ठी रखते हुए बोली, “ये लीजिये मास्टर साहब प्रेम पत्र।”
कन्नौजिया मास्टर एक दम से सकपका गए, शर्माते हुए बोले, “अरे खुले आम मत दीजिये। माना कि मैं भी आपको पसंद करता हूँ, पर बच्चों के सामने ये उचित नही है।”

प्रधानाचार्या का क्रोध अब सातवें आसमान पर था, बोलीं, “मज़ाक मत कीजिये, ये पढ़ाते हैं आप? तुम्हारे प्यार में दीवाना हुआ जाता हूँ, तुम शम्मा हो मैं परवाना हुआ जाता हूँ।”
“नही ये तो नही पढ़ाता। ये तो बच्चे अपने आप पढ़ लेते है कहीं से।” कहते हुए उन्होंने वह पर्चा उठा लिया। एक सांस पूरा पढ़कर बोले, “मुजीब इधर आओ। एक पन्ने में साठ गलती? मूर्ख कहीं के। ये पकड़ो और बीस बार सही सही लिखकर लाओ। अगर अब गलती हुई तो एक गलती पर पाँच डंडे का दंड मिलेगा।”
प्रधानाचार्या क्रोध से फुफकारते हुए बोलीं, “श्रीमान जी यह प्रेमपत्र है। आपको इमला सिखाना चाहिए लेकिन आप विमला, कमला, निर्मला सिखाते हैं, हद्द है आपसे तो बात करना ही बेकार है। मैं इस मुद्दे को ऊपर तक उठाऊंगी।” कहकर वे जितनी स्पीड से आयी थीं, उससे तेज गति में चली गयीं।
कन्नौजिया मास्टर की कुछ समझ मे नही आ रहा था कि इस मामले को कैसे डील करें। प्रेम करने की सजा देकर बच्चों को नफ़रत सिखाएं अथवा फिल्मों आदि के ज़रिए आये इस विष का छोटे बच्चों पर असर देखकर मातम मनायें। उन्होंने मुजीब को अपने पास बुलाकर पूछा, “ये शायरी किसने लिखायी?”
इससे पहले मुजीब कुछ बोलता कल्लन उसके बस्ते से कन्नौजिया मास्टर का पेन और एक पतली सी किताब उठा लाया, जिसपर लिखा था “मुहब्बत की धुंआधार सौ शायरी” मूल्य पांच रुपये।
कन्नौजिया मास्टर ने पेन जेब के हवाले किया, शायरी की किताब और मुजीब को लेकर खुली जगह में नीम के पेड़ के नीचे चले गए।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।
मुज़ीब दया का पात्र नहीं साला पत्र लिख गया इस लिए प्यार करना पड़ रहा है ,,,,बहुत हरामी है
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हृदय आनंदित हो। गया । बेहतरीन रचना
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बहुत आभार भैया।
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बहुत बढ़िया दादा।🙏
पाँचवी क्लास का इश्क बहुत ही क्लासिकल लगा।😀
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बहुत बढ़िया दादा।🙏
पाँचवी क्लास का इश्क बहुत ही क्लासिकल लगा।😀
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भैया आभार।
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Teacher bhi kam nahi hai. Vo bhi chal diye padne neem ke neeche.
Bahut umda sir..
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हा हा हा , सही पकड़े हैं नीतेश जी।
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