गिल्ली डंडा खेलने वाली अन्तिम और गली में क्रिकेट खेलने वाली प्रथम पीढ़ी होने का सैभाग्य हमारी पीढ़ी के नाम ही जाता है। सशरीर खेले जाने वाले खेल हमारी पीढ़ी ने इतना खेल डाले कि वर्तमान पीढ़ी को खेलने के लिए कुछ बचा ही नही। विज्ञान को विवश होकर वीडियो गेम मोबाइल गेम और पबजी आदि का आविष्कार करना पड़ा। क्रिकेट उस समय अपनी उठान पर था। रेडियो पर कमेंट्री सुनकर हुक शॉट लगाने की कला और बिना टप्पे के बाउंसर फेंकने का चलन उसी समय शुरू हुआ था। सुरक्षा कवच के नाम पर हेलमेट आदि मोटर साइकिल और स्कूटर चलाने वाले ही लगाते थे, बैट्समैन का सिर काफी मजबूत आता था उनदिनों।

एक बार विद्यालय स्तरीय क्रिकेट टूर्नामेंट मे मैं भी फंस गया। मेरे मित्र थे मुजीब भाई उस समय मद्दे के ज़माने में भी वे डेढ़ सौ मील प्रति घंटा के हिसाब से गेंद फेक देते थे। हम दोनों थे तो मित्र मगर टीमें अलग अलग थीं। एक समय ऐसा आया जब मैं बैटिंग कर रहा था और मुजीब भाई बोलिंग। मुजीब भाई के सामने बैटिंग करना यमराज की कुण्डी खटखा कर भागने जैसा माना जाता था।
उन्होंने ओवर की पहली गेंद फेंकी। मेरी खासियत यह भी है कि अगर सौ तक कि स्पीड में गेंद आएगी तभी मुझे दिखती है, उससे तेज गति की गेंद नही दिखती। उनकी गेंद 150 की स्पीड से मेरी ओर बढ़ी, चूंकि मैं कन्फर्म था कि नही दिखेगी लिहाजा आँखें खुली रखने का कोई फायदा नही था, सो मैंने आंखे बन्द कर लीं। शरीर मे कान बंद करने का कोई ऑप्शन भगवान ने दिया नही है इसलिए कान खुले रह गए। गेंद कान के पास से ज़ूऊऊऊऊ….. की आवाज़ करते हुए निकल गयी। मेरे पूरे शरीर ने राहत की सांस ली।
मैं भाग कर मुजीब भाई के पास गया मैंने आठ साल की अपनी दोस्ती और अपने और उनके दादाजी की पचास साल की मित्रता की दुहाई देते हुए कहा कि ऐसा करो एक सीधी गेंद धीरे से फेंक दीजिए मैं बल्ला नही लगाऊंगा और आउट हो जाऊंगा। मुजीब मान गया।
मुजीब ने 75 की स्पीड से अगली गेंद सीधी फेंक दी। भगवान जाने कैसे बल्ला गेंद की सीध में आ गया और गेंद उसका चुम्बन लेती हुई चौके वाली रस्सी से जा टकराई। मुजीब भाई आग्नेय दृष्टि से मुझे घूर रहे थे, आत्मग्लानि से लबरेज मैं नज़रे चुराता हुआ बल्ले से ठोंक कर पिच ठीक करने का झूठा अभिनय करने लगा। मेरे बायोलॉजी के मास्टर गुप्ता जी जो कि अंपायरिंग कर रहे थे, वे चौके का इशारा करते हुए कह रहे थे, “मुजीब की गेंद पर चौका? अब तो बेटा तू गया।”
मेरा मन कर रहा था धरती फटे और मैं उसमे समा जाऊं। उधर मुजीब ओवर की तीसरी गेंद फेकने की गरज से अपने बोलिंग रनअप पर गेंद से अपनी गलहरी की दाद खुजलाते हुए चल दिया। इधर मैं यह सोचने में व्यस्त हो गया कि शरीर के किस अंग पर गेंद लगे जहां दर्द अपेक्षाकृत कम होता हो। मुजीब की तीसरी गेंद कब आई और कैसे मैं अस्पताल आया मुझे अभीतक याद नही है।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ
#Theपण्डितजी वाले
हाहाहा …… मुजीब भाई को डालीगंज पुल वाले कातिल लोशन की जरूरत थी😝😝😝😝😝😝
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असल बॉलर हमेशा गेंद इसीप्रकार घिस कर चमकाते हैं। लगता है खुजली कर रहे हैं।
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Bahut kaaari wali ….dada naman
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बहुत आभार पुनीत जी।
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zabardast….tamaam yaaden taza ho gayin
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बहुत आभार।
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वाह पंडित जी बहुत ही जबरदस्त
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वाह!वाह!👌👌👌👌 गज़ब की जानकारी दी है आपने, “विज्ञान को विवश होकर वीडियो गेम मोबाइल गेम और पब्जी का आविष्कार करना पड़ा”☺☺☺☺☺
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