
चौकोर समोसे, ठोस कड़ी आइसक्रीम, च्युंगम के टक्कर की रसमलाई और छेनी-हथौड़ी से तोड़कर खाने लायक खस्तों की अपार सफलता के बाद, आज पत्नी ने जलेबी बनाने में प्रयुक्त होने वाली सामिग्री की लिस्ट थमाते हुए कहा, “आज खाना-वाना नही बनेगा। जलेबी बनाना यू ट्यूब से सीखा है। फटाफट ये सब ले आओ। गरमागरम जलेबी बनाएंगे।”
मैंने चुपचाप लिस्ट जेब के हवाले की और ये सोचता हुआ निकल पड़ा कि कोरोना से भारत मे मृत्युदर भले ही तीन प्रतिशत है पर हलवाईदर 97 प्रतिशत से अधिक ज़रूर है। जिस प्रकार वैज्ञानिक नयी दवा का प्रयोग सर्वप्रथम चूहों पर करते है, ठीक उसी तर्ज पर पत्नियां नयी डिश का पति पर।
दुकानदार ने सामान का थैला पकड़ाते हुए बताया कि, “सारा सामान दे दिया है, सिर्फ ईनो मेरे पास नही है उसकी शीशी सामने मेडिकल स्टोर से खरीद लेना।”
मेडिकल स्टोर पर ज्ञात हुआ कि जब से लॉक डाउन शुरू हुआ है ईनो कि खपत बढ़ गई है। सप्लाई कम है, इसलिए डाइजीन से काम चलाओ। ईनो से डाइजीन अधिक एफेक्टेबल होता है। मुझे मालूम था कि कैमिस्ट हमेशा जो दवा उनके पास नही होती है उसका सबटिट्यूट दे देते है सो बिना किसी हुज्जत के मैंने एक बड़ी शीशी डाइजीन की खरीद ली।
झोले से डाइजीन की शीशी निकलते ही पत्नी ने मुझे फिर अहसास दिलाया कि मैं मूर्ख हूँ, 25 साल पहले शादी में उसे चढ़ावे का जो हार दिया गया था, वह बिल्कुल हल्का था, दहेज की मोटर साइकिल मेरी मूर्खता के कारण चोरी हुई थी। दो साल पहले भूकंप से पीछे की दीवार मेरी ही गलती के कारण गिरी थी, अगर मैंने ठीक से उसकी तराई की होती तो दीवार मजबूत होती। ये तो वो है, जो निर्वाह कर रही है, अगर कोई और होती तो….. फिर अंत मे उसने बताया कि, “जलेबी को करारी करने के लिए ईनो डाला जाता है।”
मैंने कातर भाव से कहा, “कैमिस्ट कह रहा था कि डाइजीन ईनो से अच्छा काम करता है। एक बार ट्राई करने में क्या हर्ज है।”
“अरे उसे क्या मालूम कि जलेबी बनाने के लिए ईनो मांग रहे हो। वो तो तुम्हारा चेहरा देख कर समझा होगा कि कब्ज है। इसलिए ईनो नही था तो डाइजीन पकड़ा दी। दूसरी दुकान से चुपचाप ईनो लेकर आओ।”
खैर… ईनो आया, जलेबी की पहली खेप मेरे सामने डाली गई। बाकी तो ठीक था पर जलेबी पतली अधिक थी और जलाव थोड़ा मोटा। इसलिए जलेबी के अंदर ठीक से प्रविष्ट नही हो पाया था। मैंने पत्नी से आग्रह किया कि “एक कप जलाव दे दो।”
पत्नी ने “क्यों” के आगे चार-पांच प्रश्नचिन्ह लगाकर फौरन कारण जानना चाहा।
मैंने डरते हुए कहा, “जलेबी मैं हूँ और जलाव तुम। दोनों का ठीक से मिलन नही हो पा रहा है। अगर कप में जलाव मिल जाता तो बीच-बीच मे सुड़कता रहता। जलेबी भी मीठी लगती।”
“मतलब जलेबी पतली है तो जलाव भर नही रहा है अंदर। यही ना?” कहते हुए उसने कोन का छेद कैची से काटकर बड़ा कर दिया।
ये क्या…… अब एक-एक गोला तीन-तीन पाव का बनने लगा। पूरे घर मे हाय तौबा मच गई। छोटे से बड़े तक सबने मुझपर चढ़ाई कर दी। सारा दोष मुझ पर मढ़ दिया गया। फिर मेरे साथ जो हुआ उसके परिणाम स्वरूप मैं कैमिस्ट के यहां मूव लेने जा रहा हूँ। मुझे मालूम है, वह मूव की जगह आयडेक्स देगा।
©राजेन्द्र पण्डित, लखनऊ।
#Theपण्डितजी वाले।
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शुभान ल्लाह , वल्ला वल्ला ,,क्या बात है ,,,आपको नमन आपकी लेखनी को नमन ,,,,मज़ा आ गया ,,,,चरण स्पर्श
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बहुत ही सुन्दर हास्य पण्डित जी , सच हम सभी कोरोना के इस विषम काल को भी विभिन्न तरीकों से हँस हँस कर गुज़ार रहे हों मानो मानव जनित , मानव हन्ता जीवाणु का परिहास कर रहे हों। बहुत पसंद आई आपकी जलेबी , हमारी भार्या ने भी यूट्यूब पर ढूंढ ढूंढकर विभिन्न व्यंजन बनाने का अनथक प्रयास किया , गोलगप्पे तक नहीं बन सके और हम चकरघिन्नी वास्कोडिगामा की तरह सहायक सामग्री की खोज में 10-20 लीटर फूँक बैठे , कुटाई पिसाई अलग।।
बहुत ही बढ़िया लेख , पण्डित जी , बधाई।।
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हास्यरसावतार राजेन्द्र पंडित जी से जुड़ कर मुझे वही आनंद आता है, रसगुल्ले महोदय को चीनी की चाशनी में बूडने उतराने में, कचौड़ी देवी को तप्त तेल में स्नान करने में और बीज को धरती फ़ोड कर अंकुरित होने में आता है, जय हो विजय हो पण्डित जी आपकी.
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आशा है कि अब आप स्वस्थ होंगे ।
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जय जय।
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Bahut Sundar aanand aa Gaya, Badhai Rajendra Pandit Ji
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भैया की जय
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हमेशा की तरह एक बेहतरीन कथानक अनूठे विषय पर ।
बधाई अनुज 🙏
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दद्दू आभार।
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इतना सहज हास्य था आपकी कथा में कि मन हास्य की चाशनी में डूब कर फूल गया पत्नी बोली कि काहे खिल के खीला हो रहे हो हमने कहा ये लो पण्डित जी की जलेबीनामा पढ़ लो, हँसते हँसते उसने भी ख़ूब पढ़ी और बोली पंडित जी से पूछना की जब चौकोर समोसे बनायें थे उस दिन वाला मूव ख़त्म हो गया था क्या ? ☺️☺️
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बहुत आभार भैया।
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अद्भुत चाचा जी 🙏
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आपकी लेखनी और आपको नमन
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