नाम तो उनका कुछ और था लेकिन कहते सब उन्हें कल्लन ही थे। कुछ लोग प्यार से तो कुछ उसके विलोम के कारण उन्हें इस नाम से पुकारते थे। कल्लन उस समय पाँचवी और अंतिम कक्षा में बैठते थे। वे और उनके पिता इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि ज़्यादा पढ़ाई लिखाई करने से कोई लाभ नही होता सभी पढ़ने वाले कलेक्टर नही बनते और सभी न पढ़ने वाले गरीब नही होते। पढ़ाई बस इतनी होनी चाहिए कि अगर सरकार सारे नोटों का रंग एक जैसा कर दे, तब भी यह पहचान रहे कि कौन सा नोट कितनी वैल्यू का है।
कल्लन के पास एक कोट था। जिसे वे पहनते नही थे, बल्कि धारण करते थे। दीपावली के अगले दिन से होली के एक दिन पूर्व तक वे उसी कोट में निवास करते थे। इस अवधि के दौरान उन्हें बिना कोट के, और कोट को बिना कल्लन के किसी ने भी नही देखा। कर्ण के कवच वाला आइडिया महाभारत के सीरियल में कल्लन के कोट को देखकर ही चुराया गया जान पड़ता था।
कल्लन का कोट समानता का अद्भुत उदाहरण था, स्कूल हो या खेल, तिलक हो या तेरहवीं, भोजन हो या उसका विलोम, वे समान रूप से उसे धारण किये रहते थे। चूंकि कोट के अंदर कही पर एक स्टीकर लगा था कि “ड्राई क्लीन ओनली” और गांव में ड्राई क्लीनिंग की सुविधा नही थी इसलिए उसे कभी धुलवाया नही जा सका। इससे और कोई तकनीकी दिक्कत तो नही थी बस यह अनुमान लगाना मुश्किल था कि कोट का वास्तविक रंग कौन सा है।
एक दिन कन्नौजिया मास्टर की इच्छा हुई कि बच्चों से पहाड़े सुने जाएं। कल्लन के लिए पूरी पढ़ाई ही पहाड़ थी तो पहाड़े कहां से याद होते। चौदह पंचे तक आते-आते उनकी गाड़ी फंस चुकी थी। कन्नौजिया मास्टर ने घूर कर कल्लन की ओर देखा। कल्लन ने कुशल ड्राइवर की तरह बैक गियर लगाया और थोड़ा पोछे लेकर फिर एक ज़ोर लगाया। मगर चौदह पंचे का दलदल इतना ढीठ था कि पहिया जगह पर घूमता रहा, आगे न बढ़ा। जब पैतालीसवीं बार उन्होंने चौदह पंचे कहा और आगे न बढ़े तो कन्नौजिया मास्टर को अहसास हुआ कि वे सरकार से हराम की तनख्वाह ले रहे है। अतः अब उन्हें भी कुछ करना चाहिए। वे अपनी कुर्सी से सीधे कल्लन कि तरफ कूदे। कल्लन ने छात्र धर्म का निर्वाह नही किया और अपने स्थान से हट गया। नियमतः कन्नौजिया मास्टर को कल्लन पर लैण्ड होना था, किन्तु नियतितः उन्हें जमीन पर लैण्ड होना पड़ा। लैंडिग के वक्त किसी का खुला कलम भी ठीक उसी स्थान पर पड़ा था। कलम शस्त्र से अधिक मारक होता है, यह स्वतः सिद्ध हो चुका था।
कल्लन को कन्नौजिया मास्टर के क्रोध का आभास हो चुका था। बस्ते का मोह त्याग कर वह अपने कोट सहित स्कूल के गेट की तरफ भागा। कन्नौजिया मास्टर जो कि अभी एक बटा तीन ही उठ पाए थे, कल्लन की तरफ झपटे कल्लन का कोट उनके हाथ मे फंस चुका था। देखते ही देखते गुरु ने शिष्य को गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का प्रैक्टिकल करा दिया। कल्लन कोट सहित जमीन पर आठो खाने चित्त पड़े थे (चारो खाने कल्लन और चारो खाने कोट के मिलाकर)।
इसी दौरान मुजीब भाई ने कन्नौजिया मास्टर को लाकर उनका बेंत पकड़ा दिया। कल्लन और मुजीब की पुरानी खुन्नस थी, जिसमे आज कन्नौजिया मास्टर किसी भाड़े के गुंडे की तरह प्रयुक्त हो रहे थे। बेंत के हर वार पर कोट ढाई सौ ग्राम धूल उगल दे रहा था। देखते ही देखते मैरून कलर सा दिखने वाला कोट नेवी ब्लू कलर का हो गया। ड्राई क्लीनिंग कैसे होती है कल्लन सीख चुके थे।
राजेन्द्र पण्डित
#Theपण्डितजी वाले।
आपके द्वारा लिखित लघुकथाओं में, मेरी सर्वाधिक प्रिय रचनाओं में एक है ये ‘कल्लन का कोट’😊😊🙏 अद्भुत है पंक्ति पंक्ति👌👌👌 हँसा हँसा के प्राण ले लेने वाली रचना🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣
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बहुत आभार आपका।
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Spectacular 💯💯💯
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Thanks a lot
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भाईसाहब जवाब नहीं आपका गज़ब चित्रण बिल्कुल फ़िल्म सी देख रहा था ।
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Very amazing I felt that it was real..
Keep it up 👍
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बहुत शानदार दादा । गज्जब का गुरुत्वाकर्षण है आपकी भाषा में।पाठक जितना पढ़ता जाता है, उतना ही प्रसन्न होता जाता है।
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हाहाहाहा
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